अनंतकाल तक सत्ता क्यों चाहिए? Hindi News Jago Bhart

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(image) यह सिर्फ भारत की या किसी एक राज्य की समस्या नहीं है कि जो सत्ता में बैठेगा उसे अनंतकाल के लिए सत्ता चाहिए। उसका विकास का काम कभी पूरा ही नहीं होता है। जनता थक जाती है, उब जाती है पर नेता कथित विकास का काम करने के लिए सत्ता हासिल करने की जोड़-तोड़ में लगे रहते हैं। बिहार में 15 साल तक कथित विकास करने के बाद नीतीश कुमार को अभी और सत्ता चाहिए क्योंकि उनको लग रहा है कि विकास पूरा नहीं हुआ है, विकास अधूरा ही है। मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान ने 15 साल तक राज्य का विकास किया लेकिन और विकास करने के लिए उनको सत्ता में रहना है। नरेंद्र मोदी 15 साल गुजरात का विकास करके आए और देश का विकास कर रहे हैं और मरते दम तक विकास करते रहेंगे। वामपंथी पार्टियों ने 30 साल से ज्यादा समय तक पश्चिम बंगाल का विकास किया और दस साल से ममता बनर्जी विकास कर रही हैं। फिर भी बंगाल का विकास अधूरा है। नवीन पटनायक 20 साल से ओड़िशा का विकास कर रहे हैं। इनका लक्ष्य एक ही है कि चाहे जैसे हो वैसे सत्ता हासिल करनी है ताकि जनता का विकास करें। दूसरी ओर जनता है जो समझ ही नहीं रही है कि उसका विकास हो रहा है। वह जहां की तहां खड़ी है और नेता विकास करने में लगे हैं।

ऐसा नहीं है कि यह स्थिति सिर्फ भारत की या भारत के किसी एक राज्य की है। सारी दुनिया में यहीं स्थिति है। डोनाल्ड ट्रंप चार साल पहले मेक अमेरिका ग्रेट अगेन के नारे पर चुनाव जीते थे और चार साल के बाद भी उनको लग रहा है कि वे अमेरिका को फिर से महान नहीं बना सके हैं, इसलिए चार साल और चाहिए। रूस में तो व्लादिमीर पुतिन ने रूस को उसका गौरवशाली स्थान दिलाने के लिए अपना स्थान 2036 तक के लिए पक्का कर लिया है। चीन को दुनिया की एकमात्र महाशक्ति बनाने के लिए शी जिनफिंग आजीवन राष्ट्रपति रहने को तैयार हैं। सोचें, इन नेताओं का त्याग कितना बड़ा है! ये अपने देश को महान बनाने के लिए हमेशा राष्ट्रपति रहने को तैयार हैं! लेकिन असल में इनकी महानता का मोल कौड़ी भर नहीं है।

महान नेता देखना है तो नेल्सन मंडेला को देखें। करीब तीन दशक से जेल में रह छूटे मंडेला सिर्फ पांच साल तक दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति रहे और उसके बाद सत्ता छोड़ दी। वे चाहते तो आजीवन राष्ट्रपति रह सकते थे। दक्षिण अफ्रीका की जनता ऐसा चाहती भी थी पर उन्होंने इनकार कर दिया। महज पांच साल के शासन में उन्होंने वह किया, जिसकी कल्पना नहीं की गई थी। उन्होंने रंगभेद की वजह से पैदा कटुता को लगभग पूरी तरह से खत्म करा दिया। दक्षिण अफ्रीका को एक समावेशी समाज और देश बना दिया। उसके बाद आराम से रिटायर होकर अपनी पार्टी के दूसरे नेताओं को राज करते देखते रहे और एक नायक की तरह इस दुनिया के विदा हुए।
अपने भारत में ही देखें तो कई मिसालें मिल जाएंगी। लाल बहादुर शास्त्री महज ढाई साल तक देश के प्रधानमंत्री रहे। इस दौरान उनकी कमान में भारत ने एक निर्णायक जंग जीती और भूख के खिलाफ भारत की जंग पर भी विजय हासिल की। हरित क्रांति की नींव डाल कर शास्त्री ने भारत को खाद्यान्न के मामले में भारत को आत्मनिर्भर बनाने के रास्ते पर चला दिया और विदा हो गए। आजादी के बाद इस देश को सर्वाधिक बदलने वाले नेता पीवी नरसिंह राव थे। वे सिर्फ एक कार्यकाल के लिए पांच साल देश के प्रधानमंत्री रहे और पांच साल में उन्होंने भारत का कायाकल्प कर दिया। उन्हें जो करना था वह वे प्रधानमंत्री बनने के बाद पहले ही साल में कर गए थे। बाद में तो वे भी समय ही काटते रहे। वीपी सिंह एक साल इस देश के प्रधानमंत्री रहे। आप इस पर बहस कर सकते हैं कि उन्होंने जो किया वह सही था या गलत लेकिन वे सिर्फ एक मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू करने के फैसले से देश और समाज को हमेशा के लिए बदल कर गए। चंद्रशेखर महज चार महीने के लिए प्रधानमंत्री थे और उनके उसी छोटे से कार्यकाल में अयोध्या का विवाद सुलझने की कगार पर पहुंच गया था। इस देश के सबसे बेहतरीन बौद्धिक और समाजवादी विचारक राम मनोहर लोहिया और किशन पटनायक सिर्फ एक-एक बार सांसद रहे लेकिन क्या नौ बार सांसद रहे कमलनाथ को उनसे ज्यादा सफल मानेंगे?

इस देश के मुख्यमंत्रियों को देखें। के कामराज सात साल तक मद्रास के मुख्यमंत्री थे और खुद ही सत्ता छोड़ कर पार्टी का काम करने की इच्छा जताई थी। सात साल में कामराज ने पूरे राज्य का बिजलीकरण किया और शिक्षा का पूरा परिदृश्य बदल दिया। आज तमिलनाडु अगर ज्ञान-विज्ञान के मामले में देश के दूसरे राज्यों से आगे है तो उसकी बुनियाद कामराज रख कर गए थे। लेकिन क्या कई-कई बार मुख्यमंत्री रहे करुणानिधि और जयललिता उनसे ज्यादा सफल हैं? कर्पूरी ठाकुर बिहार में महज ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री बने थे और उनके बनाए फॉर्मूले पर लालू प्रसाद और नीतीश कुमार ने 30 साल राज किया है। इन दोनों का 30 साल भी कर्पूरी ठाकुर के ढाई साल से बड़ा नहीं है।

असल में कुर्सी पर बैठते ही इस देश के नेता सोच लेते हैं कि चाहे जो हो अब कुर्सी पर ही मरना है। एक मशहूर ज्योतिष ने अटल बिहारी वाजपेयी के बारे में भविष्यवाणी की थी कि वे कुर्सी पर मरेंगे। 2004 में लोकसभा का चुनाव समय से पहले कराने के पीछे भाजपा नेताओं का यह आत्मविश्वास भी था कि वाजपेयी जी तो कुर्सी पर ही मरेंगे। मरते दम तक कुर्सी पर ही बैठे रहना असल में एक किस्म का मनोविकार है, जो इस देश के राजनेताओं में कूट-कूट कर भरा है। वे कुर्सी पर बैठते ही उसके मोहपाश से बंध जाते हैं और उसके बाद उस कुर्सी को बचाने के सिवा कुछ नहीं करते हैं। उन्हें इतिहास का भी कोई ज्ञान नहीं है। भारत के प्राचीन इतिहास में चंद्रगुप्त मौर्य से लेकर मध्यकाल के शेरशाह सूरी और रजिया सुल्तान तक कई ऐसे शासक हुए, जिनका शासनकाल बहुत छोटा था लेकिन जिन्होंने इतिहास पर अमिट छाप छोड़ी

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