किसे मिलेगी सबसे पहले वैक्सीन? Hindi News Jago Bhart

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(image) कोरोना वायरस की वैक्सीन अभी बनी नहीं है, बाजार में कब तक आएगी, कहा नहीं जा सकता है पर मांगने और देने वाले पहले आ गए। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कह दिया कि इसमें भेदभाव नहीं होना चाहिए और गरीबों को पहले वैक्सीन मिलनी चाहिए। इधर भारत की वैक्सीन बीबीआईएल की लैब बन रही है और संसदीय समिति के सामने सरकार ने कहा हुआ है कि अगले साल तक यह वैक्सीन आएगी। लेकिन उससे पहले ही भारत के विदेश सचिव हर्षवर्धन शृंगला बांग्लादेश से वादा कर आए हैं कि भारत सबसे पहले उसे वैक्सीन देगा। अभी भारत खुद ही कोरोना महामारी के भारी संकट से जूझ रहा है और अगर जल्दी से जल्दी इस पर काबू नहीं पाया गया तो कोरोना से ज्यादा आर्थिक संकट से लोग मर जाएंगे।

सो, भारत की प्राथमिकता अपने 130 करोड़ लोगों में से ज्यादा से ज्यादा को वैक्सीन लगवाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। पर उसकी बजाय सरकार वैक्सीन कूटनीति पर उतर आई। वैक्सीन का अता-पता नहीं है वैक्सीन कूटनीति में बांग्लादेश को सबसे पहले रखने का ऐलान कर दिया गया। बांग्लादेश के लिए तो पहले से ही माइक्रोसॉफ्ट के मालिक बिल गेट्स बहुत कुछ कर रहे हैं। और यह भी किसी से छिपा नहीं है कि वैक्सीन के खेल के सबसे बड़े खिलाड़ी भी बिल गेट्स हैं। उन्हीं का बनवाया हुआ गावी यानी ग्लोबल एलायंस फॉर वैक्सीन एंड इम्युनाइजेशन पूरी दुनिया को वैक्सीन उपलब्ध कराने के लिए चंदा जुटा रहा है।

बिल गेट्स के बनवाए इसी संगठन ने भारत में भी सीरम इंस्टीच्यूट ऑफ इंडिया को 15 करोड़ डॉलर दिए हैं। खबर है कि दोनों के बीच वैक्सीन की दस करोड़ डोज बनाने का करार हुआ है। हैरानी की बात यह पता चल रही है कि सीरम इंस्टीच्यूट के साथ अभी तक भारत सरकार ने कोई करार नहीं किया है। पुणे का सीरम इंस्टीच्यूट वैक्सीन की जो डोज बनाएगा उसका पहला करार गावी ने किया है, जिसकी मदद से बिल गेट्स गरीब देशों में वैक्सीन बंटवाएंगे। इसमें कुछ वैक्सीन भारत को भी मिल सकती है पर भारत सरकार ने अभी अपनी ओर से वैक्सीन बनाने वाली किसी कंपनी, एजेंसी से करार नहीं कर रही है।

दूसरी ओर दुनिया के सभ्य और विकसित देश अपने नागरिकों के लिए जल्दी से जल्दी वैक्सीन जुटा लेने के लिए हजार किस्म के जतन कर रहे हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ब्रिटिश-स्वीडिश कंपनी एस्ट्रोजेनेका से 30 करोड़ डोज खरीदने का सौदा किया है। यह कंपनी ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के साथ मिल कर वैक्सीन बना रही है। ब्रिटेन ने भी इससे दस करोड़ डोज का सौदा किया है। ट्रंप सिर्फ इसी के भरोसे नहीं बैठे हैं उन्होंने वैकल्पिक उपाय के तौर पर अमेरिकी कंपनी मोडेर्ना के साथ भी दस करोड़ डोज का सौदा कर लिया है। यानी पहले जिसकी वैक्सीन आए उसकी पहली खेप अमेरिका को मिलेगी ताकि नवंबर में होने वाले चुनाव से पहले ट्रंप अपने यहां नागरिकों को टीका लगवा सकें।

उधर ऑस्ट्रेलिया ने भी वैक्सीन का करार कर लिया है। उसने कहा है कि वह अपने ढाई करोड़ लोगों को मुफ्त में वैक्सीन लगवाएगा। रूस ने वैक्सीन बना ली है और लोगों को डोज देना शुरू भी कर दिया है। खबर है कि पहली डोज राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की बेटी को लगाया गया। इसके बाद स्वास्थ्यकर्मियों और सुरक्षाकर्मियों को प्राथमिकता के आधार पर टीका लगाया जाएगा। चीन का भी टीका तैयार हो गया है और वह भी अपने नागरिकों को इसे लगाना शुरू करने वाला है।

लैब्स में वैक्सीन तैयार होने और अलग अलग देशों में इसे लेकर चल रही तैयारियों के बीच अब सारी बहस इस पर केंद्रित हो गई है कि किसे पहले वैक्सीन मिले। एक तरफ दुनिया के सारे अमीर देश अपने लोगों के लिए वैक्सीन की आपूर्ति सुनिश्चित करने में लगे हैं तो दूसरी ओर विश्व स्वास्थ्य संगठन, डब्लुएचओ जैसी संस्थाएं यह दबाव बना रही हैं कि इसमें भेदभाव नहीं होना चाहिए। डब्लुएचओ के महानिदेशक टेड्रोस एड़ेनॉम गैब्रिएसस का कहना है कि गरीब देशों में भी वैक्सीन की आपूर्ति साथ साथ होनी चाहिए या पहले होनी चाहिए। उन्होंने कहा है कि अमीर देशों में ही पहले वैक्सीन की आपूर्ति हो तो यह अच्छी बात नहीं होगी।

पर सवाल है कि कोरोना ऐसी महामारी है, अमीर और गरीब हर देश को बुरी तरह से प्रभावित किया है। इसका असर सिर्फ लोगों के स्वास्थ्य पर नहीं है। उससे ज्यादा असर देशों की अर्थव्यवस्था पर है। अमीर देशों की अर्थव्यवस्था ज्यादा प्रभावित हुई है। जापान और ब्रिटेन जैसे देशों ने अपनी विकास दर में ऐतिहासिक गिरावट की बात कही है और मंदी में जाने की आशंक जताई है। इसलिए इन देशों के लिए जरूरी है कि ये अपने यहां लोगों को जल्दी से जल्दी टीके लगवाएं ताकि अर्थव्यवस्थ पटरी पर लौटे। इन देशों को अंदेशा है कि अगर इसी तरह कोरोना का संकट चलता रहा तो उनकी आर्थिक बुरी तरह से मंदी की चपेट में आएगी और तब उसका असर आम लोगों पर वायरस से भी ज्यादा होगा। इसलिए अगर वे अपने नागरिकों को जल्दी टीका लगवाना चाहते हैं और उसकी व्यवस्था कर रहे हैं तो इस पर कैसे सवाल उठ सकता है? आखिर अर्थव्यवस्था की मंदी का असर अमीर और गरीब दोनों पर पड़ रहा है।

हां, अगर विश्व स्वास्थ्य संगठन को गरीब देशों और वहां के नागरिकों की चिंता है तो उसे दुनिया के देशों से बात करके, संयुक्त राष्ट्र संघ से दबाव डलवा कर फंड इकट्ठा करना चाहिए ताकि गरीब देशों के लिए वैक्सीन खरीदा जा सके। दुनिया के सबसे बड़े उद्योगपतियों में से एक बिल गेट्स ने ग्लोबल एलायंस फॉर वैक्सीन और इम्युनाइजेशन, गावी के जरिए फंड जुटाना शुरू किया है। हालांकि आठ सौ अरब डॉलर के प्रस्तावित फंड में अभी सिर्फ 10 फीसदी फंड इकट्ठा हो सका है। डब्लुएचओ इस फंड को बढ़वाए और उससे गरीब देशों के लिए वैक्सीन खरीद कर उनके यहां पहुंचाए तो बेहतर होगा। उसकी बजाय अमीर देशों को वैक्सीन खरीदने और अपने नागरिकों को लगवाने से रोकने या उनसे पहले गरीब देशों में वैक्सीन पहुंचाने की बात करना कोई बहुत तार्किक बात नहीं है।

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Sujeet Maurya

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