भला क्यों तनिष्क विज्ञापन पर हंगामा? Hindi News Jago Bhart

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(image) आभूषण निर्माता तनिष्क के विज्ञापन से जनित विवाद विमर्श में है। अंतर-मजहबी विवाह में गोद-भराई, जिसमें लड़की हिंदू और लड़के का परिवार मुस्लिम दिखाया गया था- उसका चित्रण करते हुए विज्ञापन को “एकात्वम” की संज्ञा दी गई। जैसे ही यह विज्ञापन प्रसारित हुआ, कई राष्ट्रवादी संगठनों ने इसे “लव-जिहाद” को बढ़ावा देने वाला बताते हुए विरोध करना प्रारंभ दिया। इसके बाद तनिष्क ने जनभावनाओं को आहत करने के लिए माफी मांगी और अपने विवादित विज्ञापन को वापस ले लिया।

जैसे शाहबानो, सैटेनिक वर्सेस, लज्जा प्रकरण के बाद एक समुदाय विशेष की भावनाओं और मान्यताओं का सेकुलरवाद के नाम पर सम्मान किया गया था, वैसे ही तनिष्क घटनाक्रम में भी होना चाहिए था। किंतु ऐसा नहीं हुआ। कारण स्वघोषित सेकुलरिस्ट, स्वयंभू उदारवादी और वामपंथी द्वारा स्थापित उस विकृत नैरेटिव में छिपा है- जिसमें मुसलमानों को इस्लाम के नाम पर एकजुट करने, तो हिंदुओं को जातियों के आधार पर बांटने का एजेंडा है।

विज्ञापन पर राष्ट्रवादी संगठनों की आपत्ति का केंद्रबिंदु “लव-जिहाद” ही है, जिसे अब भी स्वयंभू सेकुलर और स्वघोषित “वाम-उदारवादी”- भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आदि संगठनों की तथाकथित मुस्लिम विरोधी मानसिकता से उपजा “हौव्वा” और “काल्पनिक” बता रहे है। या तो “सेकुलरिस्ट-कम्युनिस्ट गैंग” झूठ बोल रहा है या फिर समाज को भ्रमित कर रहा है। इस स्थिति के लिए प्रसिद्ध लोकोक्ति- “सोते हुए को जगाना आसान है, पर सोने का नाटक करने वाले को जगाना मुश्किल” सबसे उपयुक्त है।

क्या मुस्लिम अलगाववाद एक कटु सत्य नहीं है, जिसका बीजारोपण सर सैयद अहमद खान ने 1890 के दशक में “दो राष्ट्र सिद्धांत” के रूप में किया था? क्या यह सच नहीं कि 100 वर्ष पहले इन्हीं दिनों में खिलाफत आंदोलन के दौरान 60,000 भारतीय मुस्लिम, भारत को अशुद्ध घोषित करते हुए दारुल-इस्लाम अफगानिस्तान के लिए हिजरत कर रहे थे? तब मौलाना अबुल कलाम आजाद, जोकि स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा मंत्री बने थे- उन्होंने हिजरत का फतवा पढ़ते हुए 30 जुलाई 1920 को कहा था, “शरीयत के सभी प्रावधानों, समसामयिक घटनाओं, मुसलमानों के हितों, फायदे और नुकसान को ध्यान में रखने के बाद, मैं संतुष्ट महसूस करता हूं। भारत के मुसलमानों के पास भारत से पलायन करने के अलावा कोई मार्ग नहीं है।।।जो लोग तुरंत नहीं जा सकते, उन्हें मुहाजिरीन की मदद करनी चाहिए।” यह अलग बात है कि अफगान अमीर ने हिजरत के दुष्प्रभाव जानने के बाद इस मजहबी पलायन को निलंबित कर दिया।

क्या यह सत्य नहीं कि 1930 में मुस्लिम लीग के इलाहाबाद अधिवेशन में मोहम्मद इकबाल ने औपचारिक रूप से इस्लाम के नाम पर अलग देश की मांग कर दी थी? क्या विभाजन से एक वर्ष पहले 1946 में मुस्लिम लीग ने डायरेक्ट एक्शन डे की घोषणा करते हुए कलकत्ता (कोलकाता) की सड़कों पर हजारों निरपराध हिंदुओं के नरसंहार पटकथा लिखी थी, जिसके बाद देशभर में शुरू हुए दंगों में दोनों पक्षों से कई हजार लोग मारे गए थे?

जिन वामपंथियों ने भारत के रक्तरंजित विभाजन और इस्लाम के नाम पर पाकिस्तान के जन्म में मुस्लिम लीग और ब्रितानियों के साथ मिलकर ऐड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था- आज वही कुनबा स्वघोषित सेकुलरवादियों के समर्थन से मजहबी “लव-जिहाद” को “काल्पनिक” और “हौव्वा” बताकर समाज में भ्रांति फैला रहा है। ऐसा लोग वरिष्ठ वामपंथी वी।एस। अच्युतानंदन के उस वक्तव्य पर क्या विचार रखेंगे, जो उन्होंने जुलाई 2010 में, बतौर केरल के मुख्यमंत्री दिल्ली में प्रेसवार्ता करते हुए कहा था, “केरल के इस्लामीकरण की साजिश चल रही है, जिसमें सुनियोजित तरीके से हिंदू लड़कियों के साथ मुस्लिम लड़कों के निकाह करने का षड्यंत्र चलाया जा रहा है।”

वामपंथी और सेकुलरिस्टों का जमात “लव-जिहाद” पर ईसाई संगठनों द्वारा जताई जा रही चिंता पर क्या कहेगा? इस वर्ष जनवरी में केरल कैथोलिक बिशप काउंसिल के उप-महासचिव वर्गीस वलीक्कट ने कहा था- “सेकुलर राजनीतिक दलों को कम से कम यह स्वीकार करना चाहिए कि लव-जिहाद एक सच है। इसका वैश्विक दृष्टिकोण है, जिसका संबंध इस्लाम से हैं। यह एक बड़ी समस्या है, जिसका हम वर्षों से सामना कर रहे हैं।” इसी संस्था ने 2009 में खुलासा किया था कि 2006-09 के बीच केरल में 2,600 से अधिक ईसाई महिलाओं का धोखे और लव-जिहाद के माध्यम से इस्लाम में मतांतरण किया गया था।

“लव-जिहाद” भारत तक सीमित नहीं है। विश्व के सबसे संपन्न, विकसित और प्रगतिशील देशों में से एक ब्रिटेन भी इससे अछूता नहीं है। दो वर्ष पहले एक ब्रितानी सिख संगठन ने दावा किया था कि पाकिस्तानी मूल के मुस्लिम बीते 50 सालों से भारतीय मूल की सिख युवतियों को अपने प्यार के जाल में फंसाकर उनका बलात्कार कर रहे है। कई मामलों में ऐसा भी देखने में आया था कि मुस्लिम “प्रेमी” लड़की को अपने परिवार के अन्य सदस्यों के समक्ष भी किसी वस्तु की भांति परोस देते थे। रॉकडैल-रॉदरहैम में ईसाई युवतियों (नाबालिग सहित) का यौन उत्पीड़न भी इसका उदाहरण है। यहां भी पाकिस्तानी और अफगानी मूल के मुस्लिम दोषी पाए गए थे। “लव-जिहाद” को भारत में नकारने वाले इसपर क्या कहेंगे?

ऐसा नहीं है कि “लव-जिहाद” को लेकर हिंदू समाज कुछ वर्ष पहले या तनिष्क विज्ञापन से जागृत हुआ है। बहुसंस्करणीय और प्रमुख अंग्रेजी समाचारपत्र की रिपोर्ट से खुलासा हुआ है कि इसकी जड़े उस दौर से जुड़ी है, जब परतंत्र भारत में खिलाफत आंदोलन चल रहा था और पाकिस्तान के लिए अधिकांश मुस्लिम आंदोलित थे।

बकौल उसी अंग्रेजी दैनिक, दिल्‍ली विश्वविद्यालय के इतिहासकार चारू गुप्‍ता ने 2002 में एक अभिलेखीय अनुसंधान तैयार किया था, जिसमें 1920-30 दशक में सामने आए “लव-जिहाद” से मिलते-जुलते मामलों को संग्रहित किया था। यही नहीं, एक अमेरिकी ईसाई मिशनरी क्लिफर्ड मैनशार्ट ने 1936 में लंदन से प्रकाशित हुई अपनी पुस्तक “द हिंदू-मुस्लिम प्रॉब्लम इन इंडिया” में उद्धृत किया है, “हिंदुओं में इस बात का भय था कि मुस्लिम उनकी महिलाओं को बहकाने के बाद चुराकर ले जाएंगे।”

“लव-जिहाद” का दर्शन उसी विषैले मजहबी अवधारणा में निहित है, जिसमें विश्व को “मोमिन” और “काफिर” के बीच बांटा गया है। मुस्लिमों को “लव-जिहाद” की प्रेरणा इस्लामी शब्दावली “तकैया” (TAQIYA) से मिलती है, जिसका अर्थ है- “पवित्र धोखा”। कोलंबिया विश्वविद्यालय में समाजशास्त्री यर्देन मरियमा के अनुसार, “तकैया एक इस्लामी न्यायिक शब्द है, जो शरिया के अंतर्गत एक मुस्लिम को विशेष परिस्थिति में झूठ बोलने की अनुमति देने से संबंधित है।”

क्या यह सत्य नहीं कि भारत में जितने भी “लव-जिहाद” के मामले आते है, उसमें अधिकांश मुस्लिम अपनी इस्लामी पहचान छिपाने हेतु माथे पर तिलक, हाथ में कलावा और हिंदू नामों आदि का उपयोग करते है? हाल ही उत्तरप्रदेश के बरेली स्थित ऐसा ही मामला सामने आया है, जिसमें “आठवीं फेल” बिलाल घोसी पर “विज्ञान स्नातक” हिंदू लड़की को बहला-फुसलाकर भगाने और उससे विवाह करने का आरोप लगा है। लड़की के परिजनों का आरोप है कि उनकी बेटी को झांसा देने के लिए बिलाल माथे पर चंदन-तिलक लगाता और हाथों में कलावा बांधता था, ताकि वह स्वयं को हिंदू सिद्ध कर सके। ऐसे ढेरों उदाहरण है, जिसमें राष्ट्रीय स्तर की निशानेबाज तारा शाहदेव का मामला शामिल है। तारा की शादी रंजीत सिंह कोहली नामक व्यक्ति से हुई थी, बाद में पता चला कि उसका वास्तविक नाम रकीबुल हसन है।

वास्तव में, “लव-जिहाद” उतना ही विरोधाभासी है, जितना “लेफ्ट-लिबरल” (वाम-उदारवादी) है। विश्व में जहां-जहां वामपंथी सत्तासीन हुए, वहां से उदारवाद ही विदा हो गया। लेनिन, स्टालिन, माओ, पॉल पॉट, किम जोंग और शी जिनपिंग का शासनकाल इसका सबसे बड़ा प्रमाण है, जहां असहमति और मानवाधिकारों का कोई स्थान नहीं। यह सही है कि दो व्यस्क प्रेमियों के बीच मजहब की दीवार कभी नहीं बननी चाहिए। परंतु जब तथाकथित “प्यार” के माध्यम से एक व्यस्क मजहबी कारणों से दूसरे को अपने प्रेमजाल में फंसाएं, तो उसे धोखा ही कहा जाएगा। यह कोई दो व्यस्कों के बीच “प्रेम” का मामला नहीं है, केवल “तकैया” है। (लेखक पूर्व राज्यसभा सांसद हैं।)

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