मध्य प्रदेश के नतीजों का बड़ा मतलब होगा Hindi News Jago Bhart

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(image) मध्य प्रदेश की 28 विधानसभा चुनावों के नतीजे बहुत मतलब वाले होंगे। इसलिए नहीं कि राज्य की शिवराज सिंह चौहान सरकार को इस नतीजे से बहुमत हासिल करना है। उसमें कोई मुश्किल नहीं आने वाली है क्योंकि शिवराज सरकार को बहुमत के लिए सिर्फ नौ विधायकों की जरूरत है। इसलिए सरकार के बहुमत के नजरिए से इसे देखने की जरूरत नहीं है। इसे सिर्फ इस नजरिए से भी देखने की जरूरत नहीं है कि कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में शामिल हुए ज्योतिरादित्य सिंधिया की हैसियत इससे तय होगी। उनके साथ कांग्रेस से बगावत करके भाजपा में शामिल हुए 22 पूर्व विधायक चुनाव लड़ रहे हैं। अगर इनमें से ज्यादातर नेता नहीं जीते तो सिंधिया की हैसियत भाजपा में तो कमजोर होगी ही, कांग्रेस में वापसी की राह मुश्किल बनेगी।

राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ कह रहे हैं कि उपचुनाव के बाद कांग्रेस की सरकार बनेगी। इसका कोई आधार नहीं है। कांग्रेस को सरकार बनाने के लिए सभी 28 सीटें जीतनी होंगी। सो, इस नजरिए से भी नतीजों को देखने की जरूरत नहीं है। इन नतीजों को ‘ऑपरेशन कमल’ के भविष्य के नजरिए से देखना होगा। उस नजरिए से इसका महत्व ज्यादा होने वाला है। अब तक भाजपा ‘ऑपरेशन कमल’ के तहत विपक्षी पार्टियों के विधायकों, सांसदों के इस्तीफे कराती है और फिर उन्हें अपनी पार्टी से चुनाव लड़ा कर विधायक,  सांसद बना देती है। इसलिए यह ऑपरेशन कर्नाटक में सफल हुआ है। मध्य प्रदेश में इसकी परीक्षा होनी है।

अगर कांग्रेस से इस्तीफा देने वाले ज्यादातर विधायक चुनाव जीत जाते हैं तो यह इस ऑपरेशन की सफलता होगी और इसे दूसरे राज्यों में आजमाने का रास्ता और खुलेगा। खबर है कि हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड जैसे कई राज्यों में भाजपा इस फार्मूले को आजमाना चाहती है। हरियाणा में कांग्रेस के कई नेताओं के इस्तीफा देकर भाजपा से लड़ने का प्रस्ताव मिल चुका है तो झारखंड में भी कांग्रेस और जेएमएम के कई विधायकों के सामने यह प्रस्ताव लंबित है। अगर मध्य प्रदेश में कामयाबी मिलती है तो नए राज्यों में इसके इस्तेमाल का रास्ता खुलेगा।

दूसरी पार्टियों के विधायकों की नजर भी मध्य प्रदेश के चुनाव नतीजों पर है। अगर कांग्रेस से इस्तीफा देने वाले ज्यादातर विधायक नहीं जीतते हैं तो फिर इस ऑपरेशन पर ब्रेक लगेगा। कोई भी विधायक अपनी विधायकी को खतरे में डालने का जोखिम नहीं लेगा। खास कर ऐसे राज्य में, जहां विधान परिषद भी नहीं है। ध्यान रहे कर्नाटक में विधान परिषद है और भाजपा की सरकार भी है, जो हारने वाले विधायक को उच्च सदन में भेज सकती है। मध्य प्रदेश, हरियाणा या झारखंड में यह सुविधा नहीं है।

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Sujeet Maurya

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