जाने टाइफॉयड बनाम कोरोना बुखार का अंतर-Hindi News

जाने टाइफॉयड बनाम कोरोना बुखार का अंतर-Hindi News

Hindi News – देश के दूर-दराज ग्रामीण इलाकों में अच्छी स्वास्थ्य सुविधायें न होने से कोरोना टेस्टिंग उस स्तर पर नहीं हो पा रही है जिसकी जरूरत है, ऐसे में कोरोना संक्रमण से होने वाले बुखार का इलाज झोला छाप डाक्टर टाइफॉयड समझकर करते हैं जिसका परिणाम सैकड़ों की संख्या में हुयी मौतों के रूप में सामने आया है और आता जा रहा है। ऐसे में जरूरी है कि लोगों को इन दोनों बीमारियों के लक्षणों का अंतर पता हो ताकि वे जानलेवा स्थिति से बच सकें।

टाइफॉयड पीड़ित को तेज बुखार से साथ सिर दर्द, पेट दर्द, भूख मर जाना और शरीर पर गुलाबी बारीक दाने उभरते हैं लेकिन सूंघने और स्वाद की शक्ति बनी रहती है व आक्सीजन का स्तर भी नहीं घटता।

कोरोना बुखार की वजह वायरस है जबकि टाइफॉयड एक बैक्टीरिया से होता है। कोरोना वायरस नाक और मुंह के रास्ते शरीर में प्रवेश करता है तथा चार से सात दिन में गले और फेफड़ों को संक्रमित कर गम्भीर हालात बना देता है। नाक और गला संक्रमित होने से खांसी, जुकाम,   बुखार के साथ सूंघने तथा स्वाद लेने की क्षमता चली जाती है,  फेफड़ों में वायरस की संख्या बढ़ने पर सूजन होने से सांस लेने में तकलीफ व रक्त में ऑक्सीजन स्तर घटने लगता है।

कोरोना (कोविड-19) प्रकोप को करीब दो साल होने को हैं लेकिन इसके लक्षणों और शरीर पर इसके असर के बारे में पूरी जानकारी नहीं है, इस सम्बन्ध में डाक्टर व रिसर्चर रोज नये-नये तथ्य सामने ला रहे हैं, लेकिन टाइफॉयड का पता 1879 में ही चल गया था, इसलिये यदि लोगों को इसकी सही जानकारी हो तो वे कोरोना बुखार और टाइफॉयड के बुखार में अंतर समझकर सही इलाज करा सकते हैं।

टाइफॉयड और कोरोना की पुष्टि कैसे?

यदि टेस्ट कराने की सुविधा है तो टाइफॉयड की पुष्टि ब्लड टेस्ट और कोरोना की पुष्टि स्वैब (नाक और गले का) टेस्ट से की जाती है।

क्यों होता है टाइफॉयड?

टाइफॉयड का कारण सालमोनेला टाइफी नामक बैक्टीरिया है, यह हमारे पेट (पाचन तन्त्र) को निशाना बनाता है इसका पता सन् 1879 में कार्ल जोसेफ ईबेर्थ ने लगाया था, इस सम्बन्ध में उनकी रिसर्च सन् 1880-81 में प्रकाशित हुयी जिसे मशहूर जर्मन सूक्ष्म जीव विज्ञानी डाक्टर रॉबर्ट कोच (नोबेल प्राइज विजेता) ने सत्यापित किया। यह बैक्टीरिया दूषित भोजन-पानी से शरीर में प्रवेश करके पाचन तन्त्र को अपना शिकार बनाता है, जिसकी वजह से तेज बुखार व गम्भीर स्थिति में आंतों में छेद (परफोरेशन) होने से सेप्सिस जैसी जानलेवा कंडीशन बनती है।

इस बैक्टीरिया के आंतों और ब्लडस्ट्रीम में होने की वजह से यह संक्रमित व्यक्ति के सीधे सम्पर्क  और उसके मल-मूत्र से अन्य व्यक्तियों में फैलता है। जानवर इस बीमारी को नहीं फैलाते यह केवल मनुष्यों से मनुष्यों में फैलती है।

टाइफॉयड पीड़ित को यदि समय पर इलाज मिल जाये तो वह पूरी तरह ठीक हो जाता है लेकिन इलाज न मिलने पर जान जा सकती है। एक रिसर्च के मुताबिक यदि इलाज न मिले तो पांच में से एक मरीज की मृत्यु हो जाती है। इलाज में देरी से 100 में से लगभग 4 मरीज गम्भीर रूप से पीड़ित हो जाते हैं। टाइफॉयड बैक्टीरिया (सालमोनेला टाइफी) गंदे हाथ, दूषित भोजन-पानी से आंतों में पहुंचने के बाद 1 से 3 सप्ताह में आंतों की दीवारों और ब्लड सट्रीम के बीच रास्ता बनाते हुए ब्लड में पहुंचकर पूरे शरीर में फैल जाता है। चूंकि यह पीड़ित की कोशिकाओं (सेल्स) में छिपा रहता है इसलिये इम्यून सिस्टम इसे पूरी तरह नष्ट नही कर पाता।

टाइफॉयड को गरीब देशों की बीमारी मानते हैं, अमेरिका में प्रतिवर्ष इसके 300 मामले, हमारे देश में कई लाख और दुनियाभर में करीब 2 करोड़ 70 लाख मामले सामने आते हैं।

लक्षण क्या?

टाइफाइड के लक्षण इससे संक्रमित होने के 6 से 30 दिन में उभरते हैं। इसके दो लक्षण प्रमुख हैं- तेज बुखार और शरीर पर गुलाबी बारीक दाने (रैशेज)। इसका बुखार 99 से शुरू होकर 104 तक पहुंच जाता है व गर्दन और पेट पर गुलाबी रंग के छोटे-छोटे दाने उभरते हैं, कुछ लोगों में यह दाने पीठ और हाथ-पैरों पर उभर आते हैं, लेकिन जरूरी नहीं कि ये सभी मरीजों में उभरें।

अन्य लक्षणों में पसीना आना, मांसपेशियों में दर्द, भूख मर जाना, सूखी खांसी, डॉयरिया, कब्ज, कमजोरी, पेट दर्द, पेट में सूजन और सिरदर्द जैसे लक्षण उभरते हैं। कुछ मरीजों को भ्रम, दस्त और उल्टी के लक्षण भी महसूस होते है लेकिन ये रेयर हैं।

टाइफॉयड पीड़ित के इलाज में देरी से वह अधखुली आंखों के साथ शिथिल पड़ा रहता है, अति गम्भीर मामलों में आंतें कमजोर होने से पेरिटोनिटिस कंडीशन बनती है, इसमें आंत की अंदरूनी परत के टिश्यू संक्रमित होने के कारण मृत्यु के चांस बढ़कर 62 प्रतिशत हो जाते हैं।

टाइफाइड से मिलती-जुलती एक बीमारी जिसे पैराटाइफाइड कहते हैं साल्मोनेला एंटरिका बैक्टीरिया से होती है, इसके लक्षण तो टाइफाइड के समान होते हैं लेकिन घातकता कम होती है।

क्या कॉम्प्लीकेशन्स हो सकते हैं?

टाइफॉयड का सबसे गम्भीर कॉम्प्लीकेशन है आंतों में छेद होने (परफोरेशन) से ब्लीडिंग होना। इलाज न मिलने पर बीमार होने के तीसरे सप्ताह इस कॉम्प्लीकेशन की शुरूआत होने लगती है, इसके तहत छोटी तथा बड़ी आंतों में परफोरेशन से अंदर के पदार्थ पेट में लीक होते हैं जिसका परिणाम तीव्र पेट दर्द के साथ मतली, उल्टी और ब्लड स्ट्रीम में संक्रमण (सेप्सिस) के रूप में सामने आता है। यह जानलेवा कंडीशन है इसमें तुरन्त चिकित्सीय देखभाल की जरूरत होती है। इसके अलावा मायोकार्डिाइटिस (दिल की मांसपेशियों में सूजन), इंडोकार्डिाइटिस (दिल और वॉल्व की ऊपरी परत में सूजन), मारकोटिक एन्यूरिज्म (सभी बड़ी रक्त वाहिकाओं में संक्रमण), निमोनिया, पेनक्रियाटाइटिस (पेनक्रियाज में सूजन), किडनी और ब्लेडर में संक्रमण, दिमाग और स्पाइनल कार्ड के मेम्ब्रेन्स में संक्रमण और सूजन, साइकेट्रिक समस्यायें जैसेकि डिलीरियम, हैलुसनेशन और पैरानॉयड साइकोसिस जैसे कॉमप्लीकेशन भी हो सकते हैं।

किन्हें ज्यादा रिस्क?

एशिया, अफ्रीका और साउथ अमेरिका में रहने वाले लोगों को इसका रिस्क ज्यादा है। इसके अलावा ट्रैवलिंग करने वालों, अस्पतालों के कर्मचारी और कुएं तथा नल इत्यादि का पानी पीने वालों को भी इसके संक्रमण का रिस्क बना रहता है।

क्यों और कैसे फैलता है टाइफॉयड?

टॉयफाइड का मुख्य कारण दूषित खाद्य और पेय पदार्थ हैं लेकिन टाइफॉयड संक्रमित व्यक्ति भी इसके कैरियर होते हैं और अपने सम्पर्क में आने वालों को संक्रमित कर देते हैं। बहुत से संक्रमितों में इसके लक्षण नजर नहीं आते लेकिन ये कैरियर बनकर दूसरों को बीमार कर सकते हैं। टाइफॉयड का मरीज यदि बिना हाथ धोये खाने-पीने की वस्तुएं छूता है तो इन वस्तुओं के सम्पर्क में आने वाले दूसरे व्यक्ति भी संक्रमित हो जायेंगे।

टाइफॉयड पीड़ित यदि किसी जलाशय के पास मल-मूत्र विसर्जित करे और इस जलाशय का पानी कोई दूसरा इस्तेमाल कर ले (जैसेकि कपड़े या सब्जियां धोना) तो वह भी संक्रमित हो जायेगा। यही कारण है कि गांवों में जब एक व्यक्ति को टाइफॉइड होता है तो धीरे-धीरे यह तमाम लोगों को अपनी चपेट में ले लेता है।

टाइफॉयड के मरीजों में ठीक होने के कई दिन बाद तक इसे दूसरों में फैलाने की क्षमता रहती है, यही कारण है कि कुछ मरीज ठीक होने के बाद फिर से टाइफॉयड से बीमार पड़ जाते हैं। इसके बैक्टीरिया की संक्रामकता के मद्देनजर वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन ने चेतावनी जारी की है कि टाइफॉयड से बीमार मरीज की रिपोर्ट जब तक निगेटिव न आ जाये उसे काम पर नहीं जाना चाहिये और न ही घर के सदस्यों से मिलना-जुलना चाहिये विशेष रूप से बच्चों और बूढ़ों से।

इलाज क्या है?

टाइफाइड का एक मात्र इलाज एंटीबॉयोटिक है। वर्तमान में सिप्रोफ्लोक्सासिन तथा एजीथ्रोमाइसिन जैसी एंटीबॉयोटिक का प्रयोग सर्वाधिक है। गर्भवती महिलाओं को इसकी जगह सेफ्ट्रिएक्सोन देते हैं। टाइफॉयड होने पर एंटीबॉयोटिक दवाओं के साथ पर्याप्त मात्रा में पानी पीना अनिवार्य है जिससे शरीर में पानी की कमी न हो और संक्रमण जल्द से जल्द शरीर से निकल जाये। गम्भीर मामलों में आंत में छेद (परफोरेशन) होने पर सर्जरी की जरूरत पड़ती है।

एंटीबॉयोटिक रजिस्टेंस है बड़ी दिक्कत

टाइफॉयड के इलाज में सबसे पड़ी दिक्कत एंटीबॉयोटिक रजिस्टेंस (एंटीबॉयोटिक प्रतिरोध) की है। ऐसा बड़ी मात्रा में एंटीबॉयोटिक के इस्तेमाल से हुआ है, इससे बैक्टीरिया में दवा प्रतिरोधक क्षमता विकसित होने से उस पर कई दवायें असर ही नहीं करतीं। उदाहरण के लिये टाइफाइड ट्राइमेथोप्रिम-सल्फामेथाक्साजोल और एम्प्लीसिलीन जैसी दवाओं का असर टाइफाइड के बैक्टीरिया पर बहुत कम हो गया है। ऐसी कंडीशन में एंटीबॉयोटिक रजिस्टेंस टेस्ट कराने पड़ते हैं जिससे पता चले कि मरीज को कौन सी दवा असर करेगी और कौन सी नहीं। टाइफाइड के लिये इस्तेमाल होने वाली एक प्रमुख दवा सिप्रोफ्लोक्सासिन भी ऐसी ही कठिनाइयों का सामना कर रही है क्योंकि टाइफाइड के बैक्टीरिया पर इसका असर करीब 35 प्रतिशत कम हो गया है।

कैसे बचें इससे?

जहां साफ पीने के पानी की किल्लत है वहां पर टाइफॉयड के सबसे ज्यादा केस होते हैं, इसलिये इन क्षेत्रों के निवासियों को वैक्सीन लगाने की सलाह दी जाती है। यदि आप टाइफॉयड हाई रिस्क एरिया या देश में जा रहे हैं तो टाइफॉयड वैक्सीन जरूर लगवा लें। वैक्सीन दो तरह से ली जा सकती है-  ओरल और इंजेक्शन। ओरल वैक्सीन में चार टेबलेट होती हैं और एक दिन छोड़कर एक गोली खानी होती है। अंतिम गोली को यात्रा से एक सप्ताह पहले खायें। यदि वैक्सीनेशन इंजेक्शन के रूप में है तो इसे यात्रा से दो सप्ताह पहले लगवायें।

यह बात याद रखें कि टाइफॉयड की वैक्सीन केवल 73 प्रतिशत कामयाब है इसलिये खान-पान सम्बन्धित सावधानियां बरतनी जरूरी हैं, इनके तहत कभी भी नल और  कुएं का पानी न पियें। यदि बोतल बंद पानी उपलब्ध न हो तो कार्बोनेटेड ड्रिंक लें। ग्रामीण इलाकों में पानी उबालकर पियें। स्ट्रीट फूड से बचें और पानी में बर्फ डालकर न पियें। पहले से छिले और कटे फल न खायें, यदि खाना है तो इन्हें अच्छी तरह से धोकर खुद ही छील या काट कर खायें।

वैक्सीन, कभी भी बीमार और 6 साल से कम उम्र के बच्चों को नहीं लेनी चाहिये।  इसके अलावा एचआईवी पी़ड़ित व्यक्तियों को टाइफॉयड वैक्सीनेशन की मनाही है। कुछ लोगों को वैक्सीन के साइड इफेक्ट भी होते हैं, इस सम्बन्ध में प्राप्त डेटा के मुताबिक 100 में से एक व्यक्ति को फीवर आ जाता है। यदि टेबलेट के रूप में वैक्सीन ली गयी है तो पेट सम्बन्धी समस्यायें हो सकती हैं जैसेकि उल्टी, दस्त और सिरदर्द।

साफ-सफाई का ध्यान रखें, हाथ साबुन से धोते रहें, खाना बनाने और खाने से पहले व टॉयलेट के बाद ऐसा करने से काफी हद तक बचाव सम्भव है। ट्रैवलिंग के समय एल्कोहल वाले सैनीटाइजर का प्रयोग करें, साथ ही डाक्टर से पूछकर एंटीबॉयोटिक जरूर साथ रखें।

क्या खायें टाइफॉयड में?

टॉइफाइड का बैक्टीरिया डाइजेस्टिव सिस्टम पर असर करता है ऐसे में इससे पीड़ित होने पर सही खान-पान जरूरी है ताकि जल्द से जल्द इससे निजात मिल सकें। हाई-फाइबर युक्त भोजन और फलों तथा सब्जियों का सेवन न करें इनके स्थान पर अच्छी तरह से पका हुआ हल्का खाना खायें तथा बिना बीज वाले फलों का सेवन करें। खाने में मसालों का प्रयोग न करें। ज्यादा से ज्यादा पानी पियें और बोतल बंद या उबला पानी ही इस्तेमाल करें। फलों में केला, तरबूज, सेव, पपीता इत्यादि को प्राथमिकता दें। शरीर में प्रोटीन की कमी पूरी करने के लिये उबले अंडे सबसे अच्छा सोर्स है। बिना क्रीम वाले दूध और दही का सेवन करें। पेय पदार्थों के रूप में नारियल पानी और हर्बल चाय फायदा करती है। कच्ची सब्जियां जैसेकि प्याज, ब्रोकली, गोभी और पत्तागोभी का सेवन न करें।

-विष्णु प्रिया सिंह
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