Holi 2021: जानें, रंगीले राजस्थान में कहां-कैसे मनाते हैं होली, हर जगह है अलग परंपरा ……-Hindi News

Holi 2021: जानें, रंगीले राजस्थान में कहां-कैसे मनाते हैं होली, हर जगह है अलग परंपरा ……-Hindi News

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Jaipur: होली देश के एक प्रमुख त्योहारों में शामिल है. देश में अलग-अलग तरीकों से होली खेली जाती है. होली के रंग धर्म, संप्रदाय, जाति के बंधन खोलकर भाई-चारे का संदेश देते हैं. इस दिन लोग अपने पुराने गिले-शिकवे भूल कर एक दूसरे को गले लगते हैं. फाल्गुन मास की पूर्णिमा को यह त्योहार मनाया जाता है. होली के साथ अनेक कथाएं जुड़ीं हैं. क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़े राज्य और रंगीले राजस्थान में होली खेलने के लिए भी कई तरीके दिखाई देते हैं. आइए जानें राजस्थान में कहां कैसे होली खेली जाती है…….

पुष्कर की कपड़ा फाड़ होली

अजमेर के पुष्कर में कपड़ाफाड़ होली खेली जाती है. पुष्कर में सबसे अलग अंदाज में होली मनायी जाती है. इस आयोजन में सैकड़ो की संख्या में देशी-विदेशी पर्यटक होली का आनंद लेने यहां पहुचते हैं. कपड़ाफाड़ होली का आयोजन वराह घाट चौक चौराहे पर होता है. यहां पहुचने वाले पर्यटक डीजे के संगीत पर रंग-बिरंगी गुलाल उड़ाते हुए घंटों तक ऐसे ही मस्ती करते रहते हैं. इस आयोजन की खास बात यह है कि इसमें प्रत्येक पुरुष की शर्ट फाड़ कर तारों पर बांध दी जाती है. जमीन के काफी ऊपर एक रस्सी बंधी होती है. जिस पर फटे हुए कपड़े फेंके जाते है. कपड़ा अगर रस्सी पर लटक जाता है तो सभी लोग ताली बजाते है और अगर कपड़ा नीचे गिर जाता है तो सभी लोग हाय-हाय करते है.

चंग-गींदड़ होली

फाल्गुन शुरू होते ही शेखावाटी में होली का हुडदंग शुरू हो जाता है. हर मोहल्ले में चंग पार्टी होती है. होली के एक पखवाडे पहले गींदड शुरू हो जाता है. जगह- जगह भांग घुटती है. चूड़ीदार पायजामा-कुर्ता या धोती-कुर्ता पहनकर, कमर में कमरबंध और पांव में घूंघरू बांधकर होली के दिन चंग नृत्य किया जाता है. नृत्य के साथ में होली के गीत भी गाये जाते हैं प्रत्येक पुरुष चंग को अपने एक हाथ से थामकर और दूसरे हाथ से अंगुलियों व हाथ की थपकियों से बजाते हुए वृत्ताकार घेरे में सामूहिक नृत्य करते हैं. साथ में बांसुरी और झांझ भी बजाते है. नृत्य करते वक्त पैरों में घूंघरुओं के रुनझुन की आवाज निकलती रहती है. कलाकार भांग पीकर चंग बजाते हुए नृत्य करते है. किंतु उनमें से एक या दो कलाकार महिला वेष धारण कर लेते हैं, जिन्हें ‘महरी’ कहा जाता है. हालांकि अब ये नजारे कम ही देखने को मिलते हैं.

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मुर्दे की सवारी

मेवाड़ अंचल के भीलवाड़ा ज़िले के बरून्दनी गांव में होली के सात दिन बाद शीतला सप्तमी पर खेली जाने वाली लट्ठमार होली का अपना एक अलग ही मजा है. माहेश्वरी समाज के स्त्री-पुरुष यह होली खेलते हैं. डोलचियों में पानी भरकर पुरुष महिलाओं पर डालते हैं और महिलाएं लाठियों से उन्हें पीटती हैं. पिछले पांच साल से यह परंपरा कम ही देखने को मिलती है. यहां होली के बाद बादशाह की सवारी निकाली जाती है, वहीं शीतला सप्तमी पर चित्तौड़गढ़ वालों की हवेली से मुर्दे की सवारी निकाली जाती है. इसमें लकड़ी की सीढ़ी बनाई जाती है और जिंदा व्यक्ति को उस पर लिटाकर अर्थी पूरे बाज़ार में निकालते हैं. इस दौरान युवा इस अर्थी को लेकर पूरे शहर में घूमते हैं. लोग इन्हें रंगों से नहला देते हैं.

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लठ्ठमार होली

देश में मथुरा-वृंदावन की लठ्ठमार होली पुरे देश में प्रसिद्ध है. लेकिन राजजस्थान के भरतपुर के कांमा में भी लठ्ठमार होली खेली जाती है. भरतपुर के ब्रज आंचल में होली आना कोई साधारण बात नहीं होती है. लोग जिस गोवर्धन पर्वत की परिकक्रमा लगाते है उसका एक भाग राजस्थान में भी है. राजस्थान में ब्रज का यह सबसे बड़ा भाग है. यहां भी ब्रज की ही तरह होली खेली जाती है. इन दिनों कामां में बड़े धूम-धाम से ब्रज होली महोत्सव का आयोजन हो रहा है. यहां शोभायात्रा निकाल कर लठ्ठमार होली का आगाज किया जाता है. शोभायात्रा को गणेश पुजन के साथ शुरु किया जाता है. कस्बे के प्रसिद्ध मंदिरों में गुलाल, फूलों की होली, दूध-दही होली खेली जाती है. महिलाए और पुरुष रंग-बिरंगे परिधानों में नज़र आती है. पुरुषों ने अपने सिर लाठियों से बचने को ढाल रखे हुए थे. महिलाएं इन पर लाठियां बरसा रही थीं.

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फूलो की होली

ब्रज की होली विश्वभर में मशहूर है. ऐसे ही जयपुर के गोविंद देवजी मंदिर भी राजस्थान में काफी माना जाता है. गोविंद देवजी को जयपुर का इष्ट देवता कहा गया है. इसलिए यहां भी ब्रज की तर्ज पर फूल की लाल और पीली पंखुडि़यों के साथ होली खेली जाती है. इस मंदिर में कृष्ण और राधा की प्रतिमा विराजमान है. यहां फुलोंं की होली बड़े ही धूमधाम से मनायी जाती है. राधाकृष्ण अपने भक्तों के साथ यहां फूलों की होली खेलते है. होली से पहले यहां फागोत्सव भी बड़े ही हर्षो और उल्लास के साथ मनाया जाता है. होली से पहले फागोत्सव की धूम भी लगी रहती है.

कोड़े वाली होली

श्रीगंगानगर में भी होली मनाने का ख़ास अंदाज़ है. यहां देवर भाभी के बीच कोड़े वाली होली काफ़ी चर्चित है. होली पर देवर- भाभी को रंगने का प्रयास करते हैं और भाभी-देवर की पीठ पर कोड़े मारती है. इस मौके पर देवर- भाभी से नेग भी मांगते हैं.

पत्थरमार होली

राजस्थान के जालौर के आहौर में पत्थरमार होली खेली जाती है. पत्थरमार होली राजस्थान के आदिवासी खेलते है. पत्थरमार होली ढ़ोल और चंग पर खेली जाती है. ढ़ोल और चंग की आवाज जैसे-जैसे तेज होती जाती है वैसे-वैसे दूसरे टीम को तेजी से पत्थर मारना शुरु कर देते है. बचने के लिए हल्की-फुल्की ढाल और सिर पर पगड़ी का इस्तेमाल होता है.

गेर नृत्य

पाली के ग्रामीण इलाकों में फाल्गुन लगते ही गेर नृत्य शुरू हो जाता है. यह नृत्य, डंका पंचमी से भी शुरू होता है. फाल्गुन के पूरे महीने रात में चौखटों पर ढोल और चंग की थाप पर गेर नृत्य किया जाता है. मारवाड गोडवाड इलाके में डांडी गैर नृत्य बहुत होता है और यह नृत्य इस इलाके में खासा लोकप्रिय है. यहां फाग गीत के साथ गालियां भी गाई जाती हैं. यहां स्त्री और पुरुष सभी साथ में मिलकर गेर नृत्य करते हैं.

दुध-दही की होली

राजस्थान में राजसमंद के नाथद्वारा में होली के पहले दूध-दही की होली खेली जाती है. नाथद्वारा में कृष्ण स्वरुप श्रीनाथ जी का विशाल मंदिर है. दुध-दही की होली में विशाल महोत्सव का आयोजन किया जाता है. सुबह जल्दी श्रीनाथ जी की प्रतिमा को पंचामृत से स्नान कराया जाता है. सैंकड़ों की संख्या में श्रीनाथ के भक्त उनके द्वारे पहुंचते हैं. दुध और दही में केसर मिलाकर श्रीनाथ जी को भोग लगाया जाता है. उसके बाद ठाकुर जी का यह प्रशाद भक्तों में वितरित किया जाता है. तत्पश्चात दुध-दही की होली खेली जाती है. फिर भक्तों द्वारा नाथ जी के भजन,कीर्तन किये जाते हैं. यह नंद महोत्सव की तरह ही मनाया जाता है.

डोलची होली

राजस्थान के बीकानेर में डोलची होली खेली जाती है. बीकानेर में होली एक अनोखे ही रूप में खेली जाती है. यहां दो गुटो में पानी की होली खेली जाती है. यह डोलची चमड़े की बनी होती है. चमड़े की बनी डोलची में पानी भरकर एक-दूसरे गुटों पर डाला जाता है. इस होली में सैकड़ों लोग भाग लेते हैं.

कंडो की काख़

डूंगरपुर में गोबर-कंडो की राख से होलाी खेली जाती है. अबीर के अलावा यहां कंडो की राख से होली खेलते है. यहां होली खेलने का तरीका बड़ा ही अजीब है. डूंगरपुर के लोग होली के दिन एक-दुसरे को कंडो की राख लगाते हैं और खुशियां मनाते है.

पावटा की डौलची होली

दौसा जिले के महवा तहसील में पावटा कस्बे में डौलची होली खेली जाती है. यह होली बल्लु शहीद की याद समें खेली जाती है. इसमें सैंकड़ो लोग पावटा कस्बे के हदीरा मैदान में गुर्जर समाज के लोग गांव के दो युवा दल बनाकर चमड़े की डौलची से कौड़े के रुप में रंग बरसाते है. इस होली को देखने के लिए देश के कोने-कोने से लोग यहां आते हैं. यहां के ग्रामीण अनेक पकवान से मेहमानों की खातिरदारी करते हैं. यहां होली मनाने के पीछे एक धार्मिक भावना जुड़ी हुई है. ग्रामीँणो के अनुसार दो गांवो की लड़ाई में बल्लु नाम के ग्रामाण के सिर धड़ से अलग हो गया. फिर भी वह दुश्मनो से लड़ता रहा. उस बल्लु की याद में होली खेलते है। ग्रामीणों के अनुसार एक बार होली नहीं खेली तो गांव में अकाल पड़ गया. उसके बाद बल्लु के चबुतरे पर जाकर मन्नत मांगी और माफी मांगी उसके बाद विप्पती दुर हुई.

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अंगारो की होली

अजमेर के केकड़ी और राजसमंद के लालसोट में अंगारो की होली खेली जाती है. केकड़ी में होली दिवाली पर खेली जाती है और कोई साधारण होली नहीं अंगारो की होली खेली जाती है. गोवर्धन पुजा के दिन लोग एक-दुसरे पर अंगारे फेंकते हुए होली खेलते हैंं. इस अजीब तरह की होली में लोग झुलस भी जाते हैं.

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