हरपीज सिंपलेक्स (कोरोना स्ट्रेन) की नई बला!-Hindi News

Hindi News – ब्लैक, व्हाइट और यलो फंगस के बाद कोरोना वायरस से संक्रमित हुए कुछ मरीजों में हरपीज सिम्पलेक्स वायरस का स्ट्रेन मिला जो तेजी से एक से दूसरे में फैलता है यह लाइलाज पेनफुल (दर्दनाक) सेक्सुअली ट्रांसमिटिड इंफेक्शन हैं। मेडिकल साइंस में एचएसवी कही जाने वाली इस संक्रामक बीमारी को दवाओं से शांत […]

हरपीज सिंपलेक्स (कोरोना स्ट्रेन) की नई बला!-Hindi News

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ब्लैक, व्हाइट और यलो फंगस के बाद कोरोना वायरस से संक्रमित हुए कुछ मरीजों में हरपीज सिम्पलेक्स वायरस का स्ट्रेन मिला जो तेजी से एक से दूसरे में फैलता है यह लाइलाज पेनफुल (दर्दनाक) सेक्सुअली ट्रांसमिटिड इंफेक्शन हैं। मेडिकल साइंस में एचएसवी कही जाने वाली इस संक्रामक बीमारी को दवाओं से शांत कर सकते हैं, ठीक नहीं।  एचएसवी वायरस से हरपीज सिम्पलेक्स नामक संकामक बीमारी पनपती है, जो आमतौर पर मुंह, चेहरे और जननांगों को अपनी चपेट में लेती है, वैसे ये शरीर में कहीं भी हो सकती है।

जैसे-जैसे कोरोना म्यूटेट होकर नये-नये वैरियेन्ट प्रकट कर रहा है वैसे-वैसे डा. फाउची (अमेरिकी राष्ट्रपति के मेडिकल सलाहकार) का शक, हकीकत बनता जा रहा है कि कोरोना वायरस किसी जानवर या पक्षी से नहीं आया बल्कि इसे लैब में खतरनाक वायरसों के जीन्स मिलाकर बनाया गया है। हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति जो. बाइडेन ने सीआईए सहित सभी अमेरिकन खुफिया एजेन्सियों को छह महीने की समय सीमा में इस बात की सच्चाई पता लगाने के आदेश दिये हैं।  ब्लैक, व्हाइट और यलो फंगस के बाद कोरोना वायरस से संक्रमित हुए कुछ मरीजों में हरपीज सिम्पलेक्स वायरस का स्ट्रेन मिला जो तेजी से एक से दूसरे में फैलता है यह लाइलाज पेनफुल (दर्दनाक) सेक्सुअली ट्रांसमिटिड इंफेक्शन हैं। मेडिकल साइंस में एचएसवी कही जाने वाली इस संक्रामक बीमारी को दवाओं से शांत कर सकते हैं, ठीक नहीं।

एचएसवी वायरस से हरपीज सिम्पलेक्स नामक संकामक बीमारी पनपती है, जो आमतौर पर मुंह, चेहरे और जननांगों को अपनी चपेट में लेती है, वैसे ये शरीर में कहीं भी हो सकती है। इस वायरस के दो टाइप हैं-

एचएसवी-1: मुंह और चेहरे में हरपीज का कारण वायरस का यह टाइप है। इसके संक्रमण से मुंह और चेहरे पर छाले (कोल्ड सोर) उभरते हैं व बुखार आता है। तरल पदार्थ से भरे ये छाले कुछ समय बाद फूटकर रिसते हैं व एक सप्ताह में इन पर पपड़ी बनती है।

एचएसवी-2: जननांगों में हरपीज की वजह वायरस का यह टाइप है। इसमें जननांगों, यूरेथरा (ब्लेडर से जुड़ी मूत्र मलिका), हिप्स में गुदा के आसपास, अंडकोष की थैली व जांघों में छाले पड़ते हैं जिनमें तीव्र जलन और दर्द के साथ बुखार आता है। महिलाओं के योनि क्षेत्र, गुदा के असापास और सरविक्स (गर्भाशय ग्रीवा) में तरल पदार्थ से भरे छाले बनते हैं जिनके फटने पर द्रव्य या ब्लड रिसता है। करीब एक सप्ताह में इन पर पपड़ी आती है।

हरपीज वायरस का संक्रमण सीधे सम्पर्क से एक से दूसरे में फैलता है। यदि एचएसवी वायरस से संक्रमित वयस्क किसी को चूम ले तो वह संक्रमित हो जायेगा और पूरी उम्र उसमें ये वायरस रहेगा। इसलिये हरपीज सिम्पलेक्स का संक्रमण रोकने के लिये कभी भी संक्रमित के बर्तन, कपड़े, सौन्दर्य प्रसाधन,   और लिपस्टिक या लिप बाम इत्यादि शेयर न करें। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनियाभर में 49 वर्ष से कम उम्र के 67 प्रतिशत लोग एचएसवी-1 वायरस सेरोपॉजटिव हैं,  इनमें से ज्यादातर को लक्षण महसूस नहीं होते। एचएसवी-1 वायरस (कोल्ड सोर) से संक्रमित व्यक्ति ओरल सेक्स से अपने पार्टनर के जननांगो को संक्रमित कर सकता है। ये दोनों वायरस (एचएसवी-1,2) संक्रमितों की लार, वीर्य और योनि से होने वाले डिस्चार्ज में होते हैं। एचएसवी-2 वायरस सेक्स से फैलता है। यौन क्रियाओं में लिप्त दोनों में से यदि एक भी इससे संक्रमित हैं तो तुरन्त ही यह बीमारी दूसरे को हो जायेगी। वेश्यागामी अधिकतर लोग आसानी से इसकी चपेट में आ जाते हैं।

कौन हैं आसान शिकार?

इसमें उम्र मायने नहीं रखती, जो भी संक्रमित व्यक्ति की चपेट में आयेगा, संक्रमित हो जायेगा। इसमें पूरा रिस्क व्यक्ति के इससे एक्सपोज होने पर है। पुरूषों की अपेक्षा महिलाओं को संक्रमित होने का रिस्क ज्यादा है। जो लोग बिना प्रोटेक्शन (कंडोम्) के यौन क्रियायों में लिप्त होते हैं उनके संक्रमित होने का रिस्क सर्वाधिक है। एचएसवी वायरस की प्रकृति का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों का कहना है कि कम उम्र से ही सेक्स करने वाले या जिन्हें पार्टनर बदलने या वेश्यागमन की आदत है वे हाई रिस्क पर होते हैं। यदि व्यक्ति पहले से किसी अन्य एसटीआई (सेक्सुअली ट्रांसमिटिज इन्फेक्शन) से ग्रस्त है तो वह तुरन्त इस वायरस को कैच कर लेगा। कमजोर इम्यून सिस्टम वाले भी जल्द इसके शिकार बन जाते हैं।

यदि गर्भवती महिला बच्चे को जन्म देते समय इस वायरस से संक्रमित है तो शिशु के संक्रमित होने के चांस बहुत ज्यादा हैं ऐसे में बच्चा इस वायरस के दोनों प्रकारों से संक्रमित होता है जिसका परिणाम अंधापन, ब्रेन डैमेज या मृत्यु है।

कैसे पहचाने लक्षणों को?

यह जरूरी नहीं कि हरपीज सिम्प्लेक्स के लक्षण संक्रमित के मुंह, चेहरे या शरीर के दिखाई देने वाले हिस्सों पर उभरें, ये यदि जननांगों में उभरते हैं तो दूसरा कभी नहीं जान सकता है कि सामने वाले को हरपीज सिम्पलेक्स है। बहुत से लोगों में इसके लक्षण इतने मामूली होते हैं कि गहन जांच से ही इनका पता चलता है, लेकिन ये संक्रमण उसी तरह फैलाते हैं जैसे वे लोग जिनके लक्षण सामने नजर आ रहे हैं। व्यक्ति इससे संक्रंमित है या नहीं इसे जानने के लिये इन बातों पर ध्यान दें-

– मुंह और चेहरे पर दाने या फफोले।

– पेशाब करते समय दर्द।

– जननांगों में दाने, फफोले और खुजली।

– पीठ, हिप्स, गुदा और टांगों में दर्द।

इनके अलावा संक्रमित व्यक्ति को बुखार, लिम्फ नोड में सूजन, सिरदर्द, थकान और भूख मरने जैसे लक्षण भी महसूस होते हैं। बहुत से मामलों में यह वायरस पीड़ित की आंखों में फैल जाता है मेडिकल साइंस में इसे हरपीज केराटाइटिस कहते हैं। इससे आंखों में दर्द, पानी डिस्चार्ज और गांठ बन जाती हैं। कुछ मामलों में तो लोगों की आंखें ही खराब हो गयीं।

पुष्टि कैसे?

डाक्टर, हरपीज सिम्पलेक्स की पुष्टि के लिये पूरे शरीर की गहन जांच और लक्षणों की पूछताछ करके पता लगाते हैं कि व्यक्ति इससे पीड़ित है या नहीं। यदि इससे पुष्टि न हो तो हरपीज कल्चर टेस्ट के लिये सैम्पल लैब भेजते  हैं। इस टेस्ट के लिये फफोलों या छालों के फ्लूड का स्वैब सैम्पल लिया जाता है। एंटी बॉडी ब्लड टेस्ट भी एचएसवी-1 और एचएसवी-2 की पुष्टि में मदद करता है। इसकी जरूरत उस स्थिति में होती हैं जब शरीर पर कोई छाले या दाने न उभरे। आजकल  हरपीज सिम्प्लेक्स होम टेस्टिंग किट भी उपलब्ध है जिससे घर में इसकी पुष्टि की जा सकती है।

क्या जटिलताएं हो सकती हैं?

इससे संक्रमित होने के बाद अन्य एसटीआई (सेक्सुअली ट्रांसमिटिड इन्फकेशन्स) का रिस्क बढ़ जाता है। सबसे ज्यादा चांस एड्स से संक्रमित होने के हैं। बहुत से लोगों को ब्लेडर की समस्यायें होने लगती हैं जैसेकि यूरेथरा में सूजन से यूरीनेशन में दिक्कत और दर्द। गम्भीर मामलों में यह सूजन इतनी बढ़ जाती है कि यूरेथरा की सर्जरी  करनी पड़ती है।

बहुत केसों में पाया गया कि हरपीज सिम्पलेक्स के मरीज को मेनिनजाइटिस हो गया और उनके मेम्ब्रेन तथा सेरेब्रोस्पाइनल (दिमाग और स्पाइनल कॉर्ड के आसपास भरे फ्लूड) में सूजन आ गयी। गे या होमोसेक्सुअल लोगों को प्रोक्टाइटिस बीमारी हो जाती है इसमें उनके गुदा की लाइनिंग में सूजन और दर्द रहता है। सबसे भयानक कॉम्प्लीकेशन के शिकार नवजात शिशु होते हैं, इस वायरस से संक्रमित होने पर उनकी आंखे खराब होने, ब्रेन डैमेज या मृत्यु भी हो सकती है।

इलाज क्या?

वास्तविकता में इस वायरस का कोई इलाज नहीं है, जो इलाज उपलब्ध है उससे केवल इसके प्रकोप को सीमित या शांत करते हैं। कई बार इसके लक्षण कुछ दिनों में बिना दवा के ही शांत हो जाते हैं लेकिन ये कभी भी उभर आते हैं। डाक्टर इसके लिये एसीक्लोवीर, फेमिसीक्लोविर और वालासीक्लोविर जैसी दवायें लिखते हैं। ये दवायें शरीर में संक्रमण का फैलाव रोकने के साथ इसके प्रसार को भी कंट्रोल करती हैं ताकि यह दूसरों में न फैले, साथ ही इनसे वायरस के प्रकोप की गम्भीरता और घातकता कम होती है। आमतौर पर इन्हें टेबलेट और क्रीम के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, मामला गम्भीर होने पर इंजेक्शन की जरूरत पड़ती है।

कैसे रोकें इसका फैलाव?

जैसाकि आप समझ गये होंगे कि इसका इलाज नहीं है ऐसे में यदि कोई इससे संक्रमित हो जाये तो उसकी नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वह इसे आगे फैलने से रोके और किसी अन्य को संक्रमित न होने दे। इस सम्बन्ध में विशेषज्ञों ने कुछ गाइडलाइन्स जारी की हैं-

– किसी अन्य व्यक्ति के सम्पर्क में आने से बचें।

– अपनी इस्तेमाल की हुई कोई भी वस्तु जैसेकि बर्तन, तौलिये, गहने, कपड़े, मेकअप और लिप बाम इत्यादि किसी से शेयर न करें।

– किसी भी सेक्सुअल एक्टीविटी जैसेकि सम्भोग, ओरल सेक्स, किसिंग इत्यादि में न शामिल हों।

– हाथ साबुन से धोते रहें और शरीर पर उभरे दानों या छालों पर कॉटन स्वैब से क्रीम इत्यादि लगाकर रखें, जितना सम्भव हो इन्हें हाथों से न छुएं।

– मरीज के कपड़े परिवार के अन्य सदस्यों के कपड़ों के साथ न धोयें, यदि सम्भव हो तो मरीज का बाथरूम अलग कर दें।

– गर्भवती महिलायें इसका फैलाव रोकने के लिये डाक्टर द्वारा बतायी दवायें लेती रहें जिससे यह वायरस पेट में पल रहे बच्चे तक न पहुंचे।

हरपीज सिम्प्लेक्स के साथ जीवन

यदि व्यक्ति एक दफा इससे संक्रमित हो जाये तो वह जीवनभर संक्रमित रहेगा। चाहे इसके लक्षण न उभरें, यह वायरस पूरी जिंदगी उसके नर्व सेल्स में घर बना लेता है। कुछ लोगों में लगातार इसके लक्षण उभरते हैं और कुछ को पूरे जीवन में केवल एक या दो बार। कुछ विशेष परिस्थितियां जैसेकि स्ट्रेस, मेन्सुरेशन पीरियड, बुखार या अन्य बीमारियां जिनमें इम्यूनोसप्रेसेंट दवाइयां ली जाती हों और सन बर्न से यह ट्रिगर हो जाता है। विशेषज्ञों का मत है कि हरपीज सिम्पलेक्स होने के बाद यदि शरीर में जरूरी मात्रा में एंटीबॉडी बन जाये तो इसके प्रकोप के चांस घट जाते हैं। एक स्वस्थ व्यक्ति जिसकी इम्यूनिटी अच्छी है को ज्यादा कॉम्प्लीकेशनों का सामना नहीं करना पड़ता।

जब वायरस एक्टिव हो यानी शरीर पर छाले हों तो स्नान करते समय साबुन का प्रयोग कम करें व गुनगुने पानी से नहायें। शरीर में जिस स्थान पर छाले हैं उसे साफ और सूखा रखें तथा ढीले-ढाले सूती कपड़े पहने। डाक्टर द्वारा लिखी दवायें समय पर लें तथा छालों पर क्रीम लगाते रहें।  गर्भवती महिलायें यदि इस वायरस से संक्रमित हो चुकीं हैं लेकिन वर्तमान में कोई लक्षण नहीं हैं तो भी इसके बारे में अपने डाक्टर को जरूर बतायें जिससे वह आपके बच्चे को इस वायरस से बचाकर   सुरक्षित प्रसव करा सके।
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