बस, किसी तरह लौटे किसान!-Hindi News

बस, किसी तरह लौटे किसान!-Hindi News

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(image) यही केंद्र सरकार का फिलहाल नंबर एक मिशन है लेकिन बिना कृषि बिल को वापिस लिए या रद्द किए। सरकार को 20 जनवरी तक हर हाल में दिल्ली-हरियाणा सीमा से किसानों की भीड़ खत्म करानी है। अन्यथा 26 जनवरी के जश्न में खलल का खतरा है। किसान 26 जनवरी या उससे पहले तक दिल्ली में ठुठरते रहे तो ब्रिटेन में सरदार-पंजाबी इतने है कि प्रधानमंत्री बॉरिस जानसन पर दबाव बनवा देंगे कि वे भारत नहीं जाए। सरकार के लिए आसान-सुलभ तरीका सुप्रीम कोर्ट की कमेटी की गाजर है। गुरूवार को सुप्रीम कोर्ट ने कमेटी बनाने, उससे रास्ता निकलवाने तक कानून पर अमल रोकने का सरकार से भरोसा चाहा। किसान पैरोकार पी साईनाथ जैसे को कमेटी में रखने का सुझाव भी आया। मतलब ऐसी कमेटी जिससे लगे कि किसानों के हित की चिंता करने वाले विशेषज्ञों की कमेटी है, सरकार बिल पर अमल रोक रही है तो किसान लौट कर कमेटी के फैसले तक आंदोलन स्थगित रखे।

दिक्कत तीनों कृषि बिलों के पहले से लागू होने से है। ध्यान रहे ये कानून अध्यादेश से जून से ही लागू है और सरकार का दो टूक कहना है कि तीनों कानूनों को रद्द करने का सवाल नहीं है। या तो सरकार अध्यादेश ला कर अब कानून स्थगित करने की ठोस कार्रवाई करें या कानूनों पर पुर्नविचार की दो टूक सहमति किसान संगठनों को दे तो सुप्रीम कोर्ट का कमेटी बनाने का सुझाव किसानों के गले उतरेगा।

क्या किसान और कोई तरीके से, झांसे में नहींलौटने को तैयार नहीं होंगे? क्या उन्हे जोर-जबरदस्ती, शाहीन बाग की तरह नहीं हटाया जा सकता है?मुश्किल है। इसीलिए हताशा में सरकार का गुरूवार से प्रचार शुरू हुआ है कि किसान आंदोलन के पीछे वे कम्युनिस्ट है जो 1962 की लड़ाई में चीन समर्थक थे।

इन सबसे, बदनामी के इस प्रचार से कुछ बनना नहीं है। पंजाब-हरियाणा के किसानों ने फसल के न्यूनतम दाम और जमीन की चिंता को पूरे देश के किसानों के बीच पहुंचा दिया है। भले बिहार, बंगाल में धान किसान एमएसपी से कम रेट पर बेचते रहे हो और पंजाब- हरियाणा के किसानों की तरह एमएसपी दाम की जिद्द नहीं रही हो लेकिन यह हल्ला बन गया है कि बिना मंडी वाली खुले बाजार की नई व्यवस्था में आगे बड़ी कंपनियां अपने हिसाब से खरीद रेट बनाएगी-बिगाडेगी। मन ही मन पूरे देश के किसानों में फसल के दाम का मसला गहरा पैठा है।

उस नाते मोदी सरकार के लिए आसान, सहज तरीका यह है कि न्यूनतम खरीद मूल्य याकि एमएसपी से कम पर व्यापारियों-कंपनियों की खरीद को आपराधिक बनाने का कानून बना उसे अध्यादेश में तुरंत प्रभाव से लागू कर दे। कहने को सरकार ने कहां ही हुआ है कि एमएसपी रहेगी।

उस नाते सुप्रीम कोर्ट को कमेटी बनाने की जरूरत नहीं है। किसानों के साथ बातचीत में सरकार ने जिन मांगों, बातों पर सहमति दी है उन सबकों एक नए संशोथित बिल में डाल कर अध्यादेश से आंदोलन को खत्म कराया जा सकता है। हर साल सरकार का कृषि विभाग अलग-अलग फसल की लागत का अनुमान लगा उस अनुसार न्यूनतम खरीद मूल्य की घोषणा करें और उससे कम पर खरीद को दंडनीय अपराध बनाने के साथ कांट्रेक्ट खेती में जमीन पर हर तरह किसान के ही सदैव मालिकाना हक का कानून दर्ज हो जाए तो किसान अपने आप आंदोलन खत्म कर देगा।

मगर सरकार बातों, कमेटी में उलझा कर जैसे-तैसे एक बार किसानों को दिल्ली से लौटाना चाहती है। यह रणनीति मोदी सरकार का पुराना आजमाया नुस्खा है। महाराष्ट्र के किसान, देशभर के आदिवासी चप्पल पहने, नंगे पांव मुंबई या दिल्ली पहुंचे तो उन्हे जैसे-तैसे लौटाने, सबकुछ मान लेने या यूपी सीमा से घुसने नहीं देने के तौर-तरीकों से लौटा दिया गया था। उससे आंदोलन अपने आप फेल हो गया। यह अनुभवजन्य निष्कर्ष है कि मुद्दे विशेष की आंदोलन भीड को यदि येनकेन प्रकरेण, बहाने, वायदे से वापिस घर लौट दे तो दुबारा काठ की हांडी नहीं चढती। अन्ना हजारे एक बार लौटे तो फिर हमेशा के लिए काठ की हांडी हो गए। बाद में कितनी ही बार अनशन किया न लोकपाल का हल्ला हुआ और न किसान का और न जवानो का। ऐसे ही महाराष्ट्र में शेतकरी वाले और आदिवासी आंदोलनकारी फड़नवीज सरकार से भरोसा लेकर लौटे और साख गंवा बैठे। आंदोलनकारी भूमिहीन लोगों को राजगोपालन दिल्ली ले कर आए तो वह भी वैसे ही सदगति को प्राप्त हुआ। इसलिए तय माने कि येनकेन प्रकारेण पंजाब-हरियाणा सिक्खों को दिल्ली हाईवे से बस लौटाना भर सरकार की रणनीति का कौर बिंदु है बाकि तो कृषि सुधार के तीनों बिल संविधान-कानून का स्थाई हिस्सा हो गए है और बने रहेंगे।

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Sujeet Maurya

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