बजट में मदद मिलेगी या कर्ज मिलेगा?-Hindi News

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(image) निर्मला सीतारमण बतौर वित्त मंत्री अपना दूसरा बजट पेश करेंगी। उन्होंने अपना पहला बजट कोरोना वायरस की महामारी के साये में पेश किया था। उस समय दुनिया के अनेक देशों में इस महामारी का कहर शुरू हो गया था और जिस दिन उन्होंने बजट पेश किया उस दिन तक भारत में भी केसेज आने शुरू हो गए थे। उन्होंने बजट में कोरोना वायरस के लिए किसी तरह का वित्तीय प्रावधान नहीं किया पर कोरोना का फायदा यह हुआ कि सरकार ने बिना किसी खास चर्चा के बजट पास कराया और सत्र को समय से पहले स्थगित कर दिया।

अब निर्मला सीतरमण ने कहा है कि इस बार वे ऐसा बजट पेश करेंगी, जैसा पहले कभी नहीं पेश हुआ! उन्होंने इस बारे में विस्तार से कुछ नहीं कहा। तभी लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि उन्हें डरना चाहिए या उम्मीद करनी चाहिए? यह भी समझ में नहीं आ रहा है कि वे ऐसा क्या करेंगी, जो पहले नहीं हुआ? क्या सरकार देश के सभी नागरिकों को कोरोना की महामारी के कारण हुए आर्थिक नुकसान की भरपाई के लिए नकद मदद देगी? इसकी उम्मीद नहीं की जा सकती है क्योंकि सरकार महामारी के बीच कथित तौर पर 30 लाख करोड़ रुपए का राहत पैकेज घोषित कर चुकी है लेकिन उससे आम लोगों को कोई खास फायदा नहीं हुआ है क्योंकि उसमें ज्यादातर पैसा कर्ज देने के लिए आवंटित किया गया है।

इसके उलट विकसित देशों में कोरोना के राहत पैकेज में लोगों को सीधे नकद रकम दी गई है। यहां तक कि सरकारों ने निजी कंपनियों को मदद दी ताकि वे अपने कर्मचारियों को वेतन दे सकें। इसी महीने अमेरिका ने 44 लाख करोड़ रुपए का दूसरा पैकेज घोषित किया है, जिसमें हर अमेरिकी के खाते में छह सौ डॉलर डाले जाएंगे और बेरोजगारों के लिए तीन सौ डॉलर का साप्ताहिक भत्ता दिया जाएगा। पहले राहत पैकेज में अमेरिका ने अपने हर नागरिक के खाते में 12 सौ डॉलर डाले थे। लोगों के खाते में नकद पैसा डालने का फायदा यह हुआ कि महामारी के बावजूद आर्थिकी चलती रही।

भारत में सरकार ने लोगों को नकद पैसे नहीं दिए इसकी बजाय उनसे कहा गया कि वे कर्ज लें, कंपनियों को मदद देने की बजाय कहा गया कि वे कर्ज लें, एमएसएमई सेक्टर के लिए भी कर्ज का ही प्रावधान किया गया, जीएसटी का विवाद हुआ तो राज्यों से कर्ज लेने को कहा गया। वास्तविक मदद के तौर पर सरकार ने 80 करोड़ लोगों के लिए पांच किलो अनाज और एक किले चने का बंदोबस्त किया। तभी निर्मला सीतारमण के ऐतिहासिक बजट पेश करने के वादे के बावजूद कोई खास उम्मीद नहीं जगती है। हो सकता है कि वे कुछ और कर्ज देने का प्रावधान करें। पर साथ ही इस बात की भी चिंता है कि आर्थिकी के फंडामेंटल्स को ठीक दिखाने के लिए कुछ ऐसा न किया जाए, जिससे आम लोगों पर उलटा बोझ पड़ जाए।

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Sujeet Maurya

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