मोदी की ‘थाली-ताली’ का वर्ष!-Hindi News

Hindi News – (image) क्या सोचा जाए वर्ष 2020 की राजनैतिक गपशप पर? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा है क्या? उन्ही का नहला है, दहला है और इक्का, बादशाह, बेगम, गुलाम याकि भारत की ताश के पूरे बावन पते उन्ही के है। वे ही ताश के मालिक, वे ही पत्ते बांटने वाले और वे ही […]

मोदी की ‘थाली-ताली’ का वर्ष!-Hindi News

Hindi News – (image) क्या सोचा जाए वर्ष 2020 की राजनैतिक गपशप पर? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा है क्या? उन्ही का नहला है, दहला है और इक्का, बादशाह, बेगम, गुलाम याकि भारत की ताश के पूरे बावन पते उन्ही के है। वे ही ताश के मालिक, वे ही पत्ते बांटने वाले और वे ही बाजी जीतने वाले तो राजनीति को कहां कैसे ढूंढा जाएं!  न खेल है, न खिलाड़ी है और न दर्शक! जरा याद करें नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के 2014 के वक्त को। भारत के लोगों, हिंदुओं के कौतुक के तब दसियों चेहरे थे। वर्ष 2014 में लोग इंटरनेट पर नरेंद्र मोदी और सनी लियोन को लगभग समान अनुपात में सर्च करते थे तो कम ही सही पर डा मनमोहनसिंह, सोनिया गांधी, राहुल गांधी आदि को भी सर्च करते होते थे। लेकिन दिशंबर 2020 के मौजूदा गूगल सर्च आंकडों में नरेंद्र मोदी को सर्च करने का आंकड़ा 12 प्रतिशत है और सनी लियोन की सर्च का आंकडा 32 प्रतिशत है! लेकिन बाकि सब नेता, राजनीति आऊट!

सीधा अर्थ है कि नरेंद्र मोदी हिंदुओं के दिलों में बैठ गए है, घर-घर पहुंच गए है तो भला 2014 की तरह उन्हे इंटरनेट पर सर्च करने की जरूरत कहा है। चौबीसों घंटे मीडिया की बजती थाली-ताली में वे है तो 81 करोड गरीबों की भीख की पौटली में भी है और नौ करोड किसानों को दक्षिणा देते हुए भी तो वे ही राम मंदिर के आगे साष्टांग लेटे हुए भी है। ऐसे में न राजनीति का खेल बनेगा, न विरोधी नेता पत्ते लिए हुए होंगे।

महामारी के अवसर में प्रधानमंत्री मोदी ने मोनोपॉली और सर्वज्ञता का ढ़का और बजवाया। भारत का इतिहास हमेशा याद रखेगा कि 21 वीं सदी में भारत में जब महामारी आई तो उसके राजा के आदेश पर उसे भगाने के लिए हिंदुओं ने ताली-थाली बजाई, दीया जलाया। सारे हिंदू रात नौ बजे नौ मिनट के लिए घर के बाहर निकल शंख बजाते मिले। मतलब सन् 2016 में नोटबंदी वह पहला क्षण था जब नरेंद्र मोदी भारत के घर-घर विचारणीय हुए तो 22 मार्च 2020 की रात नौ बजे भी भारत के घर-घर में ताली-थाली से मोदी मौजूद थे। महामारी, लॉकडाऊन, 1947 के विभाजन बाद पैदल यात्रियों की सर्वाधिक त्रासद यंत्रणा में नरेंद्र मोदी की सन् 2020 में जो गूंज बनी वह भारत का अनहोना कमाल है। एक अकेले नरेंद्र मोदी और उनकी सर्वज्ञता-सर्वत्रता का भारत अनुभव!  

हां, अकेले। समझे कि 2019 में लोकसभा जीत के बावजूद नरेंद्र मोदी के साथ अमित शाह की चर्चा थी तो राहुल गांधी आदि भी सियासी शतरंज में खिलाडी थे। अपना मानना है तब याकि 2019 में बतौर गृहमंत्री अमित शाह ने जम्मू-कश्मीर से धारा 370 खत्म करने, तीन तलाक, नागरिकता कानून के ऐतेहासिक निर्णयों से जो किया तो वह सन् 2019 उनका भी साल था।

पर 2020 में अकेले नरेंद्र मोदी छाये रहे। वे अकेले लॉकडाउन लगाने वाले। हिंदुओं से ताली-थाली बजवाते हुए। कोरोना महाभारत को 21 दिन में जीतते हुए। और सबसे बडा, हिंदुओं के युगपुरूष बनने का काम जो अयोध्या में रामजी के मंदिर निर्माण में भगवानजी के आगे साष्टांग लेटने का फोटोशूट। उस नाते जब तक सूरज चांद रहेगा, तब तक रामजी का नाम रहेगा तो तब तक उनका मंदिर बनवाने वाले नरेंद्र मोदी का भी अकेले नाम रहेगा, यह उपलब्धि 5 अगस्त 2020 की वह घटना है जिस पर मैंने उस दिन लिखा था कि यह ‘नरेंद्र मोदी का सर्वकालिक क्षण!’

सो 2020 का सच्चा अर्थ है कि मंदिर निर्माण, किसान बिल, स्वदेशी जैसे तमाम मामलों से आरएसएस, संघ प्रमुख मोहन भागवत, भाजपा आदि सब आउट। रामजी के आगे नरेंद्र मोदी के अकेले साष्टांग प्रणाम का  फोटोशूट सन् 2020 की वह निर्णायक प्रतीक घटना है जिसमें संघ और संघ परिवार का सर्वस्व एक अकेले आराध्य नरेंद्र मोदी को समर्पित हुआ।

ऐसा 138 करोड लोगों के भाग्य, नियति, उनकी राजनीति, आर्थिकी, सामाजिक दशा-दिशा के मामलों में भी लागू है। भारत में आज नरेंद्र मोदी की सर्वज्ञता के अलावा और है ही क्या? संसद, केबिनेट, पार्टी, आरएसएस, हिंदू धर्मं-मंदिर राजनीति सबका अकेले गोवर्धन पर्वत उठाए नरेंद्र मोदी ने सन् 2020 में इंच भर भी किसी दूसरे के टेके की, बुद्धी, ज्ञान-विज्ञान, मेहनत की गुंजाईस नहीं रखी।  

उस नाते कुछ मायनों में सन् 2020 केंद्र सरकार और नरेंद्र मोदी के मायावतीकरण का वर्ष भी है। तुलना बेढ़ब लग सकती है मगर जरा सोचे लखनऊ में मायावती ने कैसे राज किया?  दलित राजनीति को हर तरह से अपनी सर्वज्ञता में हाईजैक करके। संगठन के पितृपुरूष काशीराम (यहां मोहन भागवत या आडवाणी) को मौन अनुगामी बना उन्हे वार-त्योहार याकि जन्मदिन पर माला पहना अपना अकेला राज चलाया। वैसा ही आज क्या दिल्ली में नहीं है? तब सत्ता नैत्री के हाथों में सबकुछ केंद्रीत। नौकरशाही कंपकंपाती हुई तो एमपी, एमएलए में किसी की कोई औकात नहीं। विधानसभा वैसे ही बेमतलब जैसे 2020 में लोकसभा देखने को मिली। सामान्य बात नहीं कि दुनिया के तमाम सभ्य देशों (अमेरिका, ब्रिटेन सहित) में संसद वायरस संकट से निपटने के लिए लगातार बैठकरत रही वहीं भारत में पूरा शीतकालीन सत्र ही उड गया तो बजट सत्र व मानसून सत्र कितने दिन चले और कैसे चले वह आजाद भारत के इतिहास का कभी न भुलाने वाला अनुभव है। हां, ऐसे ही मायावती के राज की विधानसभा में भी हुआ करता था।

सोचे मायावती ने अपनी चिरस्थाई, सर्वकालिक दलित महारानी की इमेज बनाने के लिए क्या किया?  वहीं जो भारत में राजे-रजवाड़े अपनी याद के स्मारक बना कर करते थे। मतलब इमारते बनवाना, मंदिर बनवाना, मूर्तियां बनवाना। इसलिए की बाद में राज आए या न आए, कोई याद रखे या न रखे, बना डालों पत्थरों के महल, बूत और मंदिर। सो मायावती ने लखनऊ में, दिल्ली के मुहाने नोएड़ा में वे निर्माण कराएं जिनमें अपने बूत लगवाएं, अऱबों रू के खर्च से वे इमारते, स्मारक, पार्क बनाए जिससे लखनऊ की शक्ल बदली। वैसा ही

संकल्प सन् 2020 में नरेंद्र मोदी का बना। महामारी काल के बावजूद नई दिल्ली को अपनी यादगार में बदलने के लिए नई संसद, नए सेंट्रल विस्ता बनाने के अरबों रू. के प्रोजेक्ट बना डाले तो अपने ही हाथों अयोध्या में राम मंदिर का शिलान्यास, काशी का सौदर्यकरण।  आश्चर्य मत कीजिएगा यदि मंदिर पूरा बने उससे पहले विचार बने कि बतौर भक्त नरेंद्र मोदी की मूर्ति भी रामजी के सामने लगे।

ये सब छोटी बाते। इन सबसे ऊंचा कमाल सन् 2020 में नरेंद्र मोदी द्वारा हिंदुओं से ताली-थाली बजवाना है जिससे पृथ्वी के महामारी काल में जी रहे कोई आठ अरब लोगों के प्रतिनिधी सुधीजनों, राष्ट्रनेताओं में यह विचार बना व बना रहेगा कि हिंदू लोग कैसी बुद्धी रखते है!
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