अमेरिका, भारत की दिशा तब लेबनान! Hindi News Jago Bhart

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(image) लेबनान कभी पूर्व का पेरिस था। अरब-इस्लामी देशों की वित्तीय-कारोबारी राजधानी था। समृद्धि-विकास का टापू था। फ्रांस के उपनिवेश काल में ईसाई, शिया, सुन्नी, द्रुज आदि के बहुसंस्कृति प्रयोग में 1920 से शुरू वक्त से 1948 की आजादी और सन् 1975 तक दुनिया का मनभावक वैश्विक पर्यटक केंद्र था। लेकिन फिर लेबनानियों में ऐसे तेरे-मेरे के झगड़े हुए, वह राजनीति हुई, नेताओं-प्रधानमंत्रियों में सत्ता भूख का वह नंगा नाच हुआ कि लेबनान, लेबनान नहीं रहा। वह गृहयुद्ध की रणभूमि बना। पश्चिम एशिया में विकास से तराशा कोहिनूर लेबनान अचानक नेताओं के बहकावे में राजनीति का ऐसा अखाड़ा बना कि वह कोयला हो गया। क्यों ऐसा हुआ? एक वजह एक वाक्य में! राजनीति से लेबनान के लोग बंटे। पढ़े-लिखे समझदार नागरिक भी धर्म-जाति, कुनबे विशेष के नेताओं की भक्ति में ऐसे विभाजित हुए कि अलग-अलग समूह एक-दूसरे के दुश्मन बने। अरब राष्ट्रवाद के भभके ने, जहां मुसलमानों को भरमाया वहीं ईसाई भी संख्या ताकत के गुमान में ऐसे लड़ाकू हुए कि लेबनान घरेलू पानीपत की लड़ाई का मैदान बना। लाखों लोग मरे, बेघर हुए और आर्थिक बरबादी से सब चौपट।

आप सोच सकते हैं अमेरिका और भारत के मामले में लेबनान का क्या मतलब है? मतलब इसलिए कि डोनाल्ड ट्रंप और नरेंद्र मोदी दोनों की एक सी खूबी से दोनो देशों की लेबनान बनने की दिशा बनती है। ट्रंप और मोदी दोनों सत्ता और राजनीति के ऐसे मोहपाश में हैं कि दोनों ने अपने-अपने देशों को पानीपत की स्थायी लड़ाई में परिवर्तित कर दिया है। दोनों ने लोकतंत्र को, चुनाव को देश बांटने का औजार बना डाला है। दोनों ने अपनी पार्टियों को बौना बनाया और संस्थाओं पर अपनी एकछत्रता बनाई। उन्हें जर्जर बनाया। और नागरिकों को दो हिस्सों में बांटा। या तो मेरे भक्त या मेरे विरोधी। अमेरिका आज सचमुच ट्रंप समर्थक बनाम ट्रंप विरोधी के दो पालों में विभाजित है। अमेरिका कट्टरवादी गोरे-अनुदारवादी बनाम उदारवादी अमेरिकियों के दो धड़ों में विभाजित है। भारत में क्या स्थिति है? भारत में भी बिहार में और कई जगह उपचुनाव हैं। सभी चुनाव पानीपत की लड़ाई की तरह लड़े जाते हुए। नरेंद्र मोदी की भक्त सेना बनाम उनके विरोधियों के शक्ति परीक्षण के वैसे ही लड़ाई के मैदान हैं, जैसे छह साल से एक के बाद एक तमाम चुनाव रहे हैं। भारत के नतीजों में भी यह अर्थ निकलेगा कि बिहार में एनडीए जीता तो मोदी की जीत, हिंदुओ की जीत और हारे तो मोदी की हार और दुश्मनों की जीत!

तय कर सकना मुश्किल है कि डोनाल्ड ट्रंप से अमेरिका में ज्यादा विभाजन बना या नरेंद्र मोदी से भारत में आबादी का ज्यादा विभाजन हुआ। ट्रंप के गोरे भक्त और नरेंद्र मोदी के हिंदू भक्त की सोच में दुश्मनों को लेकर एक सा भाव है। जैसे भारत में मोदी भक्तों को विपक्षी पार्टियां, सेकुलर लोग, मुसलमान, एनजीओ, मानवाधिकारी, वामपंथी सभी देश के दुश्मन, जयचंद की औलादें समझ आती हैं वैसे डोनाल्ड ट्रंप के भक्त गोरे दिमाग में पैठा है कि विरोधी डेमोक्रेटिक पार्टी, जो बाइडेन, तमाम अश्वेत, तमाम गैर-ईसाई, लिबरल, वामपंथी सभी अमेरिका के पतन के लिए जिम्मेवार हैं जबकि अमेरिका गोरों का, ईसाईयों का ही होना चाहिए। इसलिए डोनाल्ड ट्रंप हारे तो अमेरिका खतरे में। अमेरिका को ट्रंप ही बचा सकते हैं, बना सकते हैं और जो उनका विरोधी है वह अमेरिका विरोधी है।

इसलिए कुछ जानकारों का मानना है कि अमेरिका में रिकार्ड तोड़ मतदान है तो बहुसंख्यक गोरों की अंतरधारा से मतदान में ट्रंप की आंधी है। फिर यदि कुछ वोट कम भी हुए तो डोनाल्ड ट्रंप सत्ता नहीं छोड़ेंगे। वे कानूनी लड़ाई लड़ेंगे। अपने समर्थकों का वाशिंगटन में हुड़दंग मचा कर अपने को चुनाव जीता घोषित कर देंगे। उफ! अमेरिकी लोकतंत्र, दुनिया की लोकतांत्रिक मशाल में एक ट्रंप से इतना विनाश जो इस सीमा तक जा कर सोचा जा रहा है। जैसे भारत में ईवीएम को ले कर सोचा जाता है। वहां ऐसी चिंता, ऐसा डर है तभी वाशिंगटन के राष्ट्रपति भवन को अभेदी किला बना दिया गया है। उसके चारों तरफ और राजधानी की तमाम मुख्य सड़कों की दुकानों के बाहर तोड़-फोड़, उपद्व की आंशका में लकड़ी-लोहे के फट्टे लग रहे हैं।

मतलब संभव है मतगणना के साथ अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन, उसका सुप्रीम कोर्ट व अन्य संस्थाएं लड़ाई के मैदान में तब्दील हों। भारत में यह काम अलग तरह से होगा। बिहार में यदि मोदी विरोधी जीत गए तब नरेंद्र मोदी और भाजपा जीते लोगों को पैसा-लालच दे कर पाला बदल करवाएंगे। तरीका-नुस्खा अलग होगा लेकिन पानीपत की लड़ाई में हमें ही जीतना है, सत्ता पर हमारा ही कब्जा होगा और हमने सत्ता छोड़ी तो हिंदुओं का क्या होगा, गोरों का क्या होगा, देश का क्या होगा, इस विचार की राजनीति वैसे ही चलेगी जैसे लेबनान में मेरोनाइट ईसाई बनाम ऑर्थोडॉक्स ईसाई, सुन्नी बनाम शिया मुस्लिम बनाम द्रुज बनाम कुर्द आदि की नेता राजनीति करते थे। नेता हमेशा इस जिद्द में कि हम कभी नहीं हारेंगे। सत्ता नहीं छोड़ेंगे। हमें तो जीतना है, हमें सत्ता भोगनी है।

सो, सत्ता की भूख में, नेता की राजनीति में देश का बंटना-बरबाद होना कैसे होता है वह लेबनान के अनुभव से प्रमाणित है तो अमेरिका के वर्तमान से दुनिया में लाइव प्रसारण है। सब सोच कर हैरान हैं कि एक डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी लोगों को किस सघनता से विभाजित कर देश के लोगों में ही पानीपत की लड़ाई करवा डाली। सोचें, एक व्यक्ति, एक नेता ट्रंप ने चार साल में अमेरिका को इतना बांटा, उसमें इतनी कलह कराई जो ढाई सौ साल के इतिहास में हिटलर, स्टालिन, साम्यवादी विचारधारा याकि अमेरिका का कोई दुश्मन भी नहीं कर पाया। कोई माने या न माने पुतिन, शी जिनफिंग याकि अमेरिका की बरबादी चाहने वाले देश आज कितने खुश होंगे। वैसी ही स्थिति भारत के दुश्मन पाकिस्तान, चीन व उन इस्लामी देशों में भी हैं, जो नरेंद्र मोदी के राज में भारत की दशा-दिशा पर नजर गड़ाए हुए हैं।

ट्रंप ने अमेरिका में नस्ली गोरों में जो मूर्खता ठूंसी है, उनकी बुद्धि का जैसा हरण किया है उससे अमेरिकी समाज-आबादी का विभाजन स्थायी बना है। ट्रंप हार भी जाएं, बाइडेन राष्ट्रपति बन जाएं तब भी उन्हें वर्चस्ववादी गोरों को समझाना, रास्ते पर लाना मुश्किल होगा। अमेरिकी आबादी को ट्रंप ने जिस तरह बांटा है, उससे राजनीति विमर्श में लंबे समय तक हम और वे की लड़ाई बनी रहेगी।

ट्रंप ने अमेरिका को बांटने की जो राजनीति की है यदि वह अमेरिका की स्थाई राजनीति हो जाती है तो वह लेबनान बनने की दिशा होगी। फिर भले उसकी बरबादी की मंजिल दस-बीस-पचास साल के क्रमशः सफर से बने। हमेशा ध्यान रहे देश का बनना-बिगड़ना दो-तीन चुनावों से नहीं बल्कि बीस-तीस साल के दिशा विशेष के राजनैतिक सफर से बनती है। लेबनान में भी धीरे-धीरे, चुनाव-दर-चुनाव की कथित पानीपत लडाई से बरबादी का सफर बना था।

तभी सोचें, यदि ट्रंप अगले चार साल राष्ट्रपति फिर बने तो अमेरिका का क्या होगा? डोनाल्ड ट्रंप और बेकाबू होंगे। अमेरिका के भीतर लड़ाई और बढ़ेगी। अमेरिका खोखला होगा। गोरे बनाम कालों बनाम लातीनी बनाम एशियाई तो धार्मिक समूहों और अमीर बनाम गरीब से लेकर उन तमाम विवादों-झगड़ों में अमेरिका धंसता जाएगा, जिनके बीज पिछले चार सालों में डोनाल्ड ट्रंप ने बोए हैं। अमेरिका पूरी तरह व्यक्तिवादी नेतृत्व की धुरी का गुलाम होगा। एक अकेला भस्मासुर वैसे ही आगे बढ़ता हुआ होगा जैसे सत्तर के दशक बाद लेबनान के कुछ नेताओं और कुनबों ने सत्ता की जिद्द में लोगों को मूर्ख बना देश की बरबादी का रोडमैप बनाया था।

तय मानें डोनाल्ड ट्रंप आसानी से सत्ता नहीं छोड़ेंगे। बावजूद इसके अपना मानना है कि दुनिया के नंबर एक देश की जनता की सामूहिक बुद्धि इतनी समर्थवान तो होगी कि अच्छे-बुरे में वह दो टूक फैसला ले। रिकार्ड तोड़ मतदान से अपने को उम्मीद है कि अमेरिकी लोग लेबनान के रास्ते पर नहीं जाएंगे।

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Sujeet Maurya

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